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क्या अपने लोगों के लिए ज़िम्मेदारियाँ निभा देना, उन्हें सचमुच समझ लेने के बराबर है?
रिटायरमेंट के बाद ज़िंदगी के खालीपन और सिगरेट के धुएँ के पीछे छुपते अब्दुल, बरसों से घर की चारदीवारी में अपनी अनकही चाहतों को सहेजे बैठी निकहत, और अपनी शर्तों पर एक आज़ाद और बराबर की साझेदारी वाली ज़िंदगी की तलाश करती उनकी बेटी अलिया—यह कहानी है एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार की, जहाँ खामोशियाँ चीखों से ज़्यादा शोर करती हैं।
शतरंज की बिसात और दफ़्तर के तर्कों से जीवन चलाने वाले अब्दुल जब अपने भीतर के अकेलेपन से रूबरू होते हैं, और अलिया की ज़िंदगी में समीर का प्रवेश होता है, तब रिश्तों की उलझनें एक नया मोड़ लेती हैं। क्या एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करते हुए दिलों की दूरियाँ मिटाई जा सकती हैं?
'धुआँ, डर और बिसात' परिवार, दाम्पत्य, पीढ़ियों के अंतर और आत्मसम्मान की एक बेहद संवेदनशील और मार्मिक कथा है, जो यह सिखाती है कि रिश्तों में सबसे कठिन चाल किसी को हराना नहीं, बल्कि उसे समझने के लिए अपने दिल में थोड़ी जगह बनाना है।
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