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क्या आपने कभी किसी को सिर्फ़ ग्यारह दिनों में अपनी पूरी ज़िंदगी बनते देखा है?
सितंबर २०१०। नाशिक का एक छोटा-सा ऑफ़िस। एक अकाउंट्स मैनेजर, जो अभी-अभी एक टूटे दिल से उबरने की कोशिश कर रहा था। और एक नई रिसेप्शनिस्ट, जिसने बिना कुछ किए उसकी पूरी दुनिया बदल दी।
यह कोई फ़िल्मी प्रेम-कहानी नहीं है। "nAshiqana" एक सच्ची कहानी है — पंद्रह साल बाद लिखी गई पंद्रह हस्तलिखित चिट्ठियों से बनी हुई।
गणेशोत्सव की रौनक़, सारडा सर्कल की वो शाम, एसएमएस के ज़माने की एक लाइन, बारिश के बाद की वो ख़ुशबू जिसका नाम बाद में रखा गया — नाशिकाना — और एक वादा, जो गणपति बाप्पा के विसर्जन से पहले पूरा होना था।
हर तारीख़, हर रास्ता, हर मुलाक़ात — जैसी हुई, वैसी ही लिखी गई है। सिर्फ़ नाम बदले गए हैं।
यह किताब उन लोगों के लिए नहीं है जो सिर्फ़ परफ़ेक्ट लव-स्टोरी ढूँढ़ते हैं। यह उनके लिए है जो मानते हैं कि असली मोहब्बत परफ़ेक्ट नहीं होती — बस सच्ची होती है।
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