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गीत हमेशा संगीत से पैदा नहीं होते।
कभी कोई अनुभव गीत बन जाता है।
कभी कोई पीड़ा। कभी कोई प्रश्न।
कभी कोई विस्मय। कभी कोई व्यवस्था देखकर उपजा आक्रोश। और कभी-कभी कोई ऐसी स्थिति, जिस पर रोना चाहिए या हँसना—समझ नहीं आता—तो वह व्यंग्य बन जाती है।
इन गीतों की शुरुआत भी कुछ ऐसी ही है।
मैंने जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर बहुत कुछ देखा—व्यवसाय, प्रबंधन, शिक्षा, समाज, लोगों की समस्याएँ, सरकारी व्यवस्था की विसंगतियाँ, व्यक्तिगत संघर्ष, उम्र का बदलता शरीर, neuro myelopathy और उससे उत्पन्न परेशानियाँ।
इन गीतों के पीछे एक और निरंतर चलने वाली भावना है—और अधिक जानने की इच्छा। जितना इस सृष्टि को देखने और समझने की कोशिश करता हूँ, उतना ही महसूस होता है कि हम कितना कम जानते हैं। ब्रह्मांड की विराटता, प्रकृति की अद्भुत रचना, जीवन का रहस्य और अस्तित्व की अनंत यात्रा आज भी मेरे लिए विस्मय का विषय हैं। शायद इसी कारण मन बार-बार प्रश्न करता है, सीखना चाहता है और उस अद्भुत सृष्टि के रहस्यों को थोड़ा और समझना चाहता है।
विस्मय मेरे लिए केवल आश्चर्य नहीं, सीखने की शुरुआत है। कोई नया प्रश्न जन्म ले, कोई अनदेखी बात दिखाई दे, किसी साधारण घटना में असाधारण कुछ दिख जाए—तो मन फिर एक नई यात्रा पर निकल पड़ता है। शायद यही यात्रा इन गीतों में भी दिखाई देती है।
शब्द पहले भी लिखता रहा हूँ। किताबें भी लिखीं। विचार भी साझा किए। लेकिन गीत लिखना एक अलग अनुभव है।
गीत में विचार को तर्क की तरह समझाना नहीं पड़ता। उसे महसूस कराया जा सकता है।
इसीलिए कभी एक गंभीर सामाजिक प्रश्न कुछ पंक्तियों में उतर आया, कभी दर्द में हास्य घुल गया, कभी प्रकृति से संवाद होने लगा और कभी मन ने स्वयं से कहा—
चलते रहो। चरैवेति।
इन गीतों में कोई एक शैली नहीं है।
कुछ गीत सरल हैं। कुछ व्यंग्यात्मक।
कुछ दार्शनिक। कुछ सामाजिक। कुछ व्यक्तिगत। कुछ प्रार्थना जैसे। और कुछ केवल मुस्कुराने के लिए।
लेकिन इनके पीछे एक धागा समान है—
जीवन को केवल जीना नहीं, देखना भी है।
देखना ही नहीं, समझना भी है।
और समझना ही नहीं, जहाँ आवश्यक हो वहाँ बदलने की कोशिश भी करनी है।
यह पुस्तक उसी यात्रा का एक संगीतमय दस्तावेज़ है।
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