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गाँव की मिट्टी से निकला एक साधारण लड़का, सपनों को पूरा करने के लिए जयपुर आता है।
एक छोटा-सा किराए का कमरा, किताबों का बोझ, कोचिंग और लाइब्रेरी की जद्दोजहद—यही उसकी ज़िंदगी बन जाती है।
इसी संघर्ष के बीच वो एक लड़की से मिलता है।
वो भी उसी कोचिंग की छात्रा है। धीरे-धीरे मुलाक़ातें बढ़ती हैं, और एक अनकहा रिश्ता जन्म लेता है।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर होता है… लड़की अचानक जयपुर छोड़कर चली जाती है, और पीछे रह जाता है वही लड़का—एक कमरे की तन्हाई और ढेरों सवालों के साथ।
रात की ख़ामोशी में जब नींद भी साथ छोड़ देती है, तो उसे एक सपना आता है—जहाँ वो और वो लड़की फिर से साथ होते हैं। लेकिन आँख खुलते ही हकीकत उसे झकझोर देती है… वो अब भी उसी अकेले कमरे में पड़ा है।
यह कहानी है सपनों, संघर्ष और अधूरे रिश्तों की।
एक ऐसे सफ़र की, जिसमें मोहब्बत भी है, तन्हाई भी… और अनकही यादें भी।
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