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सिनेमा एक ऐसा आईना है, जिसमें समाज खुद को देखता है। लेकिन क्या होता है तब, जब यह आईना ही धुंधला हो जाए?
‘संस्कृति रक्षक’ के भीतर एक दूसरी कहानी है—निर्माता धनपाल की फिल्म ‘चप्पल, चुम्बन और कलेक्शन’ की। उस दुनिया की, जहाँ कहानी से ज्यादा मायने रखता है कलेक्शन, सच्चाई से ज्यादा बिकती है सनसनी, और ‘चप्पल, चुम्बन और कलेक्शन’ सिर्फ एक टाइटल बनकर रह जाती है।
यह व्यंग्य उपन्यास हमें ले जाता है उस फिल्म इंडस्ट्री के भीतर, जहाँ हर कोई ‘सफलता’ का सपना देखता है। जहाँ कला बनाम व्यापार, सच्चाई बनाम दिखावा, और संस्कृति बनाम मनोरंजन आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। कभी हास्य के माध्यम से, कभी तीखे व्यंग्य के जरिए, यह कहानी उन परतों को हटाती है जिन्हें अक्सर कैमरा छिपा लेता है।
‘संस्कृति रक्षक’ आपको हँसाएगी भी, चौंकाएगी भी, और अंत में एक ऐसा सवाल छोड़ जाएगी जिसका जवाब शायद आसान नहीं होगा। यह किताब आपको उस दुनिया की सच्चाई दिखाएगी, जिसे आप अब तक सिर्फ पर्दे पर देखते आए हैं।
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