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रात के दो बजे, कोटा के एक हॉस्टल में एक 19 साल का लड़का पंखे को घूर रहा है। उसकी मौत उस रात नहीं — बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।
यह किताब एक एफ़आईआर है — उस आम आदमी की तरफ़ से, जो हर रोज़ कुछ ग़लत होते देखता है और चुप रह जाता है। परवरिश से लेकर पेपर लीक तक, कोचिंग के धंधे से लेकर भीड़ की हिंसा तक, बाबाओं के साम्राज्य से लेकर अदालतों में दफ़न हुए मुक़दमों तक — अदालती दस्तावेज़ों, सरकारी रिपोर्टों और असली मामलों के सहारे यह किताब एक ही सवाल पूछती है: इन सबके वक़्त हम क्या कर रहे थे?
15 अध्याय। 60 से ज़्यादा दस्तावेज़ी मामले। हर दावे के पीछे स्रोत — किताब के अंत में पूरी संदर्भ-सूची के साथ।
यह किताब उनके लिए है जो सोचते बहुत हैं, पर बोल नहीं पाते। भाषा जान-बूझकर कड़वी है — क्योंकि शराफ़त से लिखी किताबों से आज तक कुछ नहीं बदला।
ऑडिटोरियम ख़ाली नहीं है। बोलो। ज़ोर से।
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