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हम सब एक अधूरे सच के साथ जी रहे हैं।
जब हम जीवन की शुरुआत करते हैं, तो हमें लगता है कि भौतिक चीजें, रिश्ते और भावनाएं ही जीवन का आधार हैं। परंतु, समय एक ऐसी छलनी है जो हर झूठे मुखौटे को छान देती है। यह पुस्तक सिर्फ कविताओं का एक संग्रह नहीं है; यह उस कुरुक्षेत्र का विस्तार है जो हर इंसान अपने भीतर लड़ रहा है।
"मनुष्य: एक अधूरा सच" मनुष्य की उस अधूरी खोज का एक प्रमाण है, जहाँ जीवन का संघर्ष अंततः उसे आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। यह उन योद्धाओं की आवाज़ है जिन्होंने दूसरों से अपेक्षाओं का बोझ उतार कर, समय के चक्र को समझते हुए, अपने कर्म की नाव को अकेले ही आगे बढ़ाना सीख लिया है।
इस पुस्तक में आप जानेंगे:
माया और मुखौटे: स्वार्थ के तराजू पर तौले जाने वाले रिश्तों का यथार्थ।
कुरुक्षेत्र और संघर्ष: एकांत की वह भट्टी जहाँ पुरानी मान्यताएं जलकर राख होती हैं और मनुष्य फौलाद बनता है।
साक्षी भाव: बिना किसी अपेक्षा या शोर के, एक मौन दर्शक बनकर अपने निष्काम कर्म को करने का अटल मार्ग।
क्या आप पूर्ण होने के लिए तैयार हैं?
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