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मनुष्य: एक अधूरा सच

Karan Singh Negi
Type: Print Book
Genre: Philosophy
Language: Hindi
Price: ₹100 + shipping
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Description

हम सब एक अधूरे सच के साथ जी रहे हैं।

जब हम जीवन की शुरुआत करते हैं, तो हमें लगता है कि भौतिक चीजें, रिश्ते और भावनाएं ही जीवन का आधार हैं। परंतु, समय एक ऐसी छलनी है जो हर झूठे मुखौटे को छान देती है। यह पुस्तक सिर्फ कविताओं का एक संग्रह नहीं है; यह उस कुरुक्षेत्र का विस्तार है जो हर इंसान अपने भीतर लड़ रहा है।

"मनुष्य: एक अधूरा सच" मनुष्य की उस अधूरी खोज का एक प्रमाण है, जहाँ जीवन का संघर्ष अंततः उसे आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। यह उन योद्धाओं की आवाज़ है जिन्होंने दूसरों से अपेक्षाओं का बोझ उतार कर, समय के चक्र को समझते हुए, अपने कर्म की नाव को अकेले ही आगे बढ़ाना सीख लिया है।

इस पुस्तक में आप जानेंगे:

माया और मुखौटे: स्वार्थ के तराजू पर तौले जाने वाले रिश्तों का यथार्थ।

कुरुक्षेत्र और संघर्ष: एकांत की वह भट्टी जहाँ पुरानी मान्यताएं जलकर राख होती हैं और मनुष्य फौलाद बनता है।

साक्षी भाव: बिना किसी अपेक्षा या शोर के, एक मौन दर्शक बनकर अपने निष्काम कर्म को करने का अटल मार्ग।

क्या आप पूर्ण होने के लिए तैयार हैं?

About the Author

करण सिंह नेगी एक स्वतंत्र चिंतक, लेखक, और शोधकर्ता हैं, जिन्होंने परंपरागत धाराओं से अलग होकर जीवन के असली मायनों को ढूंढना चुना है। विज्ञान और तर्क (logic) की समझ रखने के साथ-साथ, उनका झुकाव दर्शन (Philosophy), श्रीमद्भगवद्गीता, और चाणक्य-नीति के सटीक और कठोर यथार्थ के प्रति बहुत गहरा रहा है।

उनका मानना है कि जीवन का असली सच और ताकत भीड़ का हिस्सा बनने में या किसी उपाधि (degree) को बटोरने में नहीं, बल्कि एकांत की भट्टी में तपकर "स्थितप्रज्ञ" (stable) होने में मिलती है। यह पुस्तक उनके इसी दार्शनिक चिंतन, मानसिक दृढ़ता और जीवन के कठिन अनुभवों का एक निष्पक्ष सार है।

एक लेखक के रूप में, उनका उद्देश्य पाठकों को झूठी अपेक्षाओं में रखना नहीं, अपितु उन्हें इस रंगमंच पर एक स्वतंत्र, दृढ़ और मौन दर्शक (observer) बनाना है।

Book Details

Publisher: self-published
Number of Pages: 25
Dimensions: 5"x8"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Saddle Stitched)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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