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किताब के बारे में
क्या कभी ऐसा हुआ है कि सबको खुश रखते-रखते आप खुद को ही भूल गई हों?
नैना की कहानी एक ऐसी लड़की की है, जो हमेशा दूसरों की ज़रूरतों, उम्मीदों और खुशियों को अपने से पहले रखती रही। वह हर बात पर समझौता करती है, हर बार “हाँ” कह देती है और अपनी इच्छाओं को धीरे-धीरे पीछे छोड़ देती है।
लेकिन एक दिन उसे एहसास होता है कि दूसरों को समझते-समझते उसने खुद को समझना ही छोड़ दिया है।
फिर शुरू होती है उसकी एक नई यात्रा—खुद को पहचानने, अपनी सीमाएँ तय करने, “नहीं” कहना सीखने, असफलताओं से उबरने और अपनी आवाज़ वापस पाने की।
“जिस दिन मैंने खुद को चुना” सिर्फ नैना की कहानी नहीं है। यह उन सभी लोगों के लिए है जो कभी न कभी अपने सपनों, इच्छाओं और पहचान को दूसरों की अपेक्षाओं के पीछे छोड़ चुके हैं।
यह कहानी याद दिलाती है कि खुद को चुनना स्वार्थ नहीं है। कभी-कभी यह अपने जीवन को फिर से जीना शुरू करने का पहला कदम होता है।
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