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Author (लेखक): महिपाल सिंह टंडनCo-Author (सह-लेखक): आशीष पाल सिंह Book Description (पुस्तक विवरण):क्या आरक्षण वास्तव में एक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम है, या यह सत्ता और प्रतिनिधित्व का एक संवैधानिक उपकरण है?भारतीय सार्वजनिक विमर्श में 'आरक्षण' शायद सबसे अधिक चर्चित, परंतु सबसे कम समझा गया विषय है। महिपाल सिंह टंडन द्वारा लिखित यह गहन अकादमिक कृति इसी मौलिक अंतर को स्पष्ट करती है। पुस्तक यह स्थापित करती है कि आरक्षण का उद्देश्य किसी नागरिक की आर्थिक स्थिति सुधारना नहीं, बल्कि राज्य के नीति-निर्माण अंगों (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) में हाशिए के समाजों की सार्थक और आनुपातिक उपस्थिति सुनिश्चित करना है।यह पुस्तक प्राचीन शास्त्रीय परंपराओं से लेकर इक्कीसवीं सदी के समकालीन संकटों तक एक विस्तृत यात्रा तय करती है। इसमें वर्ण-व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भों, पूना पैक्ट के राजनीतिक द्वंद्वों, और न्यायपालिका के ऐतिहासिक निर्णयों का तटस्थ व तार्किक विश्लेषण किया गया है।पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ:दार्शनिक और ऐतिहासिक आधार: अरस्तू के वितरणात्मक न्याय, बूर्दियू के सांस्कृतिक पूँजी सिद्धांत और वैश्विक मॉडलों (अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, मलेशिया आदि) का तुलनात्मक अध्ययन।गंभीर सामाजिक विश्लेषण: 'मेरिट' के पारंपरिक दावों की समाजशास्त्रीय जाँच और संस्थागत पहुँच के अंतर्संबंधों की पड़ताल।समकालीन बहसों का कवरेज: क्रीमी लेयर की राजनीति, SC/ST उप-वर्गीकरण, आर्थिक आरक्षण (EWS), नवंबर 2022 का अदालती फैसला, निजीकरण, और एआई (AI) के युग में प्रतिनिधित्व के नए संकट।मीडिया, न्यायपालिका और कॉरपोरेट जगत: मुख्यधारा के न्यूज़रूम, कोलेजियम व्यवस्था, मंदिरों के वित्तीय साम्राज्य और स्वतंत्र डिजिटल मीडिया की भूमिका पर बेबाक और तथ्यात्मक चर्चा।यह पुस्तक किसी एक पक्ष की पैरवी नहीं करती, बल्कि उन संरचनात्मक प्रश्नों से जुड़ने का एक गंभीर आमंत्रण है, जिनका उत्तर भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करेगा। यदि आप आरक्षण, सामाजिक न्याय और भारतीय लोकतंत्र की गहराइयों को अकादमिक और तार्किक दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए एक अनिवार्य पठनीय दस्तावेज है।
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