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सतनामी यात्रा
सत्य, संघर्ष और स्वाभिमान की सदियों लंबी गाथा
भारत के इतिहास में हज़ारों वर्षों से चली आ रही जातिगत विषमता के बीच, छत्तीसगढ़ की धरती से एक ऐसी आवाज़ उठी जिसने कहा — "मनखे-मनखे एक समान।"
सतनामी यात्रा सतनामी समाज के उस लंबे, संघर्षपूर्ण सफ़र की कहानी है — लोकस्मृति में बसे राजा चंवरसेन और संत रविदास से लेकर, नारनौल के 1672 के विद्रोह, गुरु घासीदास जी के सत्य-आधारित सतनाम दर्शन, गुरु बालकदास जी की शहादत, भूमि और सम्मान के लिए लड़ी गई लड़ाइयों, औपनिवेशिक काल की पहचान-राजनीति, संविधान सभा और मिनीमाता के संसदीय संघर्ष से होते हुए आज तक की यात्रा।
यह पुस्तक दो तरह के सच को एक साथ, पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत करती है — वह इतिहास जो अभिलेखों में दर्ज है, और वह इतिहास जो पीढ़ियों की श्रद्धा और मौखिक परंपरा में जीवित रहा है। जहाँ गुरु-वंश, जैतखाम, डोला-प्रथा और गिरौदपुरी जैसे धाम एक समुदाय के आत्मसम्मान की गाथा कहते हैं, वहीं "स्वतंत्र पहचान" जैसे आज भी अनसुलझे सवाल इसे केवल अतीत नहीं, वर्तमान से भी जोड़ते हैं।
सतनामी यात्रा उन सभी पाठकों के लिए है जो सतनामी समाज के इतिहास, संघर्ष और दर्शन को गहराई से, निष्पक्षता के साथ समझना चाहते हैं — यह एक समुदाय की गौरव-गाथा भी है, और आत्म-मंथन की ईमानदार पुकार भी।
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