Description
सिस्की – क्रांति की गर्जना
(SISKI – Kranti ki Garjana)
हर घर में एक सिस्की दबी होती है — कभी दहेज की वेदी पर, कभी कानून के कागज़ों में, कभी दफ़्तर और चूल्हे के बीच बँटे एक दिन में, कभी अपने ही नाम की तलाश में, कभी अपनी कोख पर उठे किसी और के सवाल में।
सिस्की – क्रांति की गर्जना भारतीय स्त्री के जीवन की उस यात्रा की कहानी है जो सदियों से दबी सिसकियों से शुरू होकर आज एक गर्जना में बदल रही है। यह किताब किसी एक स्त्री की नहीं — हर उस स्त्री की कहानी है जिसे कभी दहेज तौलकर परखा गया, जिसे कानून ने अधिकार तो दिए पर घर की चौखट तक नहीं पहुँचने दिए, जिसे "मर्दानगी" और "चरित्रहीनता" के दोहरे तराज़ू पर तौला गया, जिसने दफ़्तर और घर की दोहरी चक्की में अपना समय, अपनी नींद और अपना नाम तक खो दिया, और जिसकी कोख पर उसकी अपनी इच्छा से ज़्यादा समाज की मर्ज़ी चली।
पंद्रह से इक्कीस अध्यायों में फैली यह किताब समाजशास्त्र, कानून और मानवीय कहानी को एक साथ बुनती है — दहेज की अर्थव्यवस्था से लेकर संविधान और सामाजिक यथार्थ के बीच की खाई तक, नैतिकता के दोहरे मापदंडों से लेकर करियर और घर के बीच पिसती ज़िंदगी तक, और नाम-वंश की मिटती पहचान से लेकर कोख पर अधिकार के सबसे कठिन सवाल तक।
यह किताब आरोप नहीं लगाती — यह सवाल पूछती है। और हर सवाल के अंत में एक ही उत्तर गूँजता है: गरिमा, समानता और स्वतंत्रता।
सिस्की अब केवल सिस्की नहीं रही। वह गर्जना बनने की राह पर है।
लेखक परिचय
सिस्की — क्रांति की गर्जना
SISKI – KRANTI KI GARJANA
लेखक की दृष्टि
एम. एस. टंडन (महिपाल सिंह टंडन) हिन्दी के उन लेखकों में हैं जो इतिहास को केवल तिथियों और शासकों की सूची नहीं, बल्कि उन अनसुनी आवाज़ों का अभिलेख मानते हैं जिन्हें सत्ता की परतों ने दबा दिया। उनका लेखन समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शन और मानवाधिकार-चेतना के संगम पर खड़ा है — जहाँ हर सामाजिक प्रश्न अंततः एक नैतिक प्रश्न बन जाता है: क्या इस व्यवस्था में सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज़ का भी कोई मूल्य है?
सिस्की — क्रांति की गर्जना इसी प्रश्न से जन्मी पुस्तक है। लेखक की दृष्टि में "सिस्की" किसी एक स्त्री का विलाप नहीं — वह उस सम्पूर्ण ऐतिहासिक मौन का नाम है जो सदियों तक दर्ज नहीं हुआ; और "गर्जना" कोई प्रतिशोध की पुकार नहीं — वह न्याय, अधिकार और मानवीय गरिमा की घोषणा है। इसी कारण यह पुस्तक न किसी हिंसा को महिमामंडित करती है, न किसी पीड़ा को ढकती है।
लेखन-शैली और सरोकार
लेखक का आग्रह है कि इतिहास को विरोधाभास सहना सीखना होगा — क्योंकि वास्तविक जीवन साफ-सुथरे नैतिक खानों में नहीं रहता। इसी कारण उनका लेखन एकपक्षीय निष्कर्षों से बचता है और पाठक को तैयार उत्तर देने के बजाय सोचने की दिशा देता है। बाल विवाह, विधवा-निर्वासन, शिक्षा से वंचना, जाति और वर्ग की दोहरी मार, बाज़ार और डिजिटल युग की नई अदृश्य बेड़ियाँ, तथा वैश्विक सत्ता-संरचनाओं में स्त्री-शोषण — इन सभी को वे एक ही सूत्र से जोड़कर देखते हैं: मनुष्य की स्वायत्तता।
उनकी भाषा साहित्यिक है, पर उसका उद्देश्य अलंकरण नहीं — उद्देश्य यह है कि जो बात कही जा रही है, वह पाठक के विवेक तक पहुँचे। वे अंतर्राष्ट्रीय विचार-परंपराओं (सबाल्टर्न अध्ययन, intersectionality, फूको की सत्ता-अवधारणा) का उपयोग करते हैं, किन्तु उन्हें भारतीय सामाजिक यथार्थ की ज़मीन पर उतारकर।
अन्य कृतियाँ
एम. एस. टंडन क्षितिज का सफ़र, बहती धारा: एक प्रेम कथा, पाठशाला तथा सतनामी यात्रा: वैश्विक चेतना और सामाजिक क्रांति के भी लेखक हैं। उनका सम्पूर्ण लेखन एक ही केन्द्रीय आस्था के इर्द-गिर्द घूमता है — किसी के पंख काटकर कोई सभ्यता ऊँची नहीं उड़ सकती।
ISBN: 9789334485608
Publisher: Mahipal Singh Tandan
Number of Pages: 272
Dimensions: 6"x9"
Interior Pages: B&W
Binding:
Hard Cover (Case Binding)
Availability:
In Stock (Print on Demand)