You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution

Add a Review

Kailash: Ek Shikhar Ekant

Ek Shikhar Ekant
Maneesh Khatri
Type: Print Book
Genre: Religion & Spirituality, Sapiential Novel
Language: Hindi
Price: ₹399 + shipping
This book ships within India only.
Price: ₹399 + shipping
Dispatched in 5-7 business days.
Shipping Time Extra

Description

कैलाश: एक शिखर, एकांत

‘कैलाश: एक शिखर, एकांत’ केवल एक पर्वत, एक तीर्थ या एक धार्मिक प्रतीक की कथा नहीं है। यह मनुष्य के भीतर मौजूद उस शिखर की खोज है, जहाँ पहुँचने के लिए किसी बाहरी मार्ग से अधिक आवश्यक है—अपने भीतर उतरने का साहस।

कैलाश सदियों से मनुष्य की कल्पना, आस्था और आध्यात्मिक चेतना का एक अद्भुत केंद्र रहा है। उसकी ऊँचाई जितनी भौतिक है, उससे कहीं अधिक वह मनुष्य की चेतना में एक प्रतीक के रूप में उपस्थित है। वह शिखर, जिसे आँखें दूर से देख सकती हैं, लेकिन जिसका अर्थ केवल भीतर की यात्रा से समझा जा सकता है।

इस कृति में कैलाश एक स्थान से आगे बढ़कर एक अनुभव बन जाता है। एक ऐसा अनुभव, जिसमें प्रकृति और मनुष्य, मौन और शब्द, आस्था और प्रश्न, जीवन और अस्तित्व एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं।

एकांत का अर्थ

इस पुस्तक के केंद्र में ‘एकांत’ है।

लेकिन यह एकांत उस अकेलेपन का नाम नहीं है जिसमें मनुष्य स्वयं को संसार से अलग महसूस करता है। यह वह एकांत है जिसमें मनुष्य पहली बार स्वयं के सबसे निकट आता है।

हम अपने जीवन में लगातार लोगों, संबंधों, अपेक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और सामाजिक आवाज़ों से घिरे रहते हैं। हम दूसरों को समझने में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि स्वयं को सुनना भूल जाते हैं। कैलाश का एकांत इसी भूली हुई आवाज़ को वापस खोजने का अवसर बनता है।

यहाँ मौन रिक्तता नहीं है।

मौन स्वयं एक भाषा है।

और कभी-कभी जीवन के सबसे गहरे उत्तर शब्दों में नहीं, बल्कि उसी मौन में मिलते हैं।

कैलाश एक शिखर से अधिक

कैलाश की ओर देखना केवल एक पर्वत की ओर देखना नहीं है। वह मनुष्य को उसकी सीमाओं का बोध कराता है।

पर्वत स्थिर है और मनुष्य गतिशील। पर्वत मौन है और मनुष्य प्रश्नों से भरा हुआ। पर्वत समय के पार खड़ा दिखाई देता है, जबकि मनुष्य अपने छोटे-से जीवन, अपनी स्मृतियों और अपनी अधूरी इच्छाओं में उलझा रहता है।

यही विरोधाभास इस कृति की आत्मा बनता है।

कैलाश मनुष्य से जैसे पूछता है—

तुम जिस शिखर की तलाश संसार में कर रहे हो, क्या वह तुम्हारे भीतर भी मौजूद है?

यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हर उस मनुष्य का है जिसने कभी अपने जीवन के अर्थ को लेकर ठहरकर सोचा है।

आस्था और प्रश्न के बीच

‘कैलाश: एक शिखर, एकांत’ आस्था को केवल स्वीकार करने की वस्तु के रूप में नहीं देखता। यह आस्था के साथ प्रश्नों को भी स्थान देता है।

क्या ईश्वर केवल मंदिरों और तीर्थों में है?

क्या आध्यात्मिकता किसी विशेष स्थान तक सीमित हो सकती है?

क्या मनुष्य स्वयं से मिलने के लिए किसी पर्वत तक जाए, या पर्वत केवल उसके भीतर की यात्रा का बहाना है?

क्या त्याग संसार को छोड़ देना है, या अपनी अनावश्यक इच्छाओं से मुक्त होना?

ऐसे प्रश्न इस कृति को केवल धार्मिक या यात्रा-वृत्तांत बनने से आगे ले जाते हैं। यहाँ कैलाश एक **दार्शनिक प्रतीक** बनता है—एक ऐसा दर्पण जिसमें मनुष्य स्वयं को देखने लगता है।

प्रकृति और मनुष्य का संवाद

कैलाश की कल्पना प्रकृति से अलग नहीं की जा सकती।

बर्फ, आकाश, हवाएँ, ऊँचाइयाँ, नदियाँ, चट्टानें और विस्तृत निस्तब्धता—ये सभी इस कृति में केवल दृश्य नहीं हैं। वे मनुष्य के भीतर चल रहे संवाद के सहभागी बनते हैं।

जहाँ शहरों में शोर मनुष्य को स्वयं से दूर करता है, वहीं पर्वत का मौन उसे स्वयं के पास ले आता है।

प्रकृति यहाँ पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक जीवंत पात्र की तरह उपस्थित होती है।

कभी वह प्रश्न करती है, कभी उत्तर देती है और कभी केवल मौन रहकर मनुष्य को उसके भीतर झाँकने देती है।

प्रेम, विरक्ति और अस्तित्व

मनुष्य की सबसे गहरी यात्राएँ अक्सर उसके संबंधों से होकर गुजरती हैं।

प्रेम हमें किसी दूसरे से जोड़ता है, लेकिन वही प्रेम कभी-कभी हमें अपनी सीमाओं, अपेक्षाओं और अधूरेपन से भी परिचित कराता है। विरक्ति का अर्थ तब प्रेम का विरोध नहीं रह जाता; वह प्रेम को उसके स्वार्थ और अधिकार से मुक्त करने की प्रक्रिया बन सकता है।

यह कृति इसी जटिल मानवीय अनुभव को छूती है।

यह पूछती है कि—

क्या किसी को प्रेम करना उसे प्राप्त करना है?

क्या किसी को खो देना वास्तव में उसके अस्तित्व को खो देना है?

और क्या किसी व्यक्ति से दूर होकर भी उसके भीतर उपस्थित रहा जा सकता है?

इन प्रश्नों के बीच ‘एकांत’ एक दंड नहीं, बल्कि आत्मबोध का स्थान बन जाता है।

मनुष्य की भीतर की यात्रा

कैलाश की यात्रा जितनी बाहर की ओर है, उतनी ही भीतर की ओर भी।

मनुष्य जब किसी शिखर की ओर बढ़ता है तो वह केवल दूरी तय नहीं करता; वह अपने भीतर की कई परतों को पीछे छोड़ता जाता है—अहंकार, भय, अपेक्षाएँ, दिखावा, असुरक्षा और उन सभी पहचानाओं को जिन्हें उसने स्वयं के चारों ओर बना लिया है।

ऊँचाई पर पहुँचते-पहुँचते शायद प्रश्न बदल जाते हैं।

जहाँ यात्रा के आरंभ में मनुष्य पूछता है—

“मुझे क्या मिलेगा?”

वहीं यात्रा के अंत में प्रश्न हो सकता है—

“मुझे क्या छोड़ना है?”

और शायद यही इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा है।

कैलाश और आत्मबोध

इस कृति में कैलाश किसी अंतिम उत्तर का प्रतीक नहीं है।

वह एक ऐसी उपस्थिति है जो मनुष्य को प्रश्न पूछते रहने के लिए प्रेरित करती है।

क्योंकि आत्मबोध शायद किसी एक क्षण में प्राप्त होने वाली उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य स्वयं को जितना समझता है, उतना ही उसे अपने भीतर की अनंत जटिलताओं का एहसास होता जाता है।

कैलाश इसलिए अंतिम मंज़िल नहीं है।

वह भीतर की यात्रा का एक आरंभ है।

एक शांत, गहन और आत्मिक अनुभव

‘कैलाश: एक शिखर, एकांत’ उन पाठकों के लिए है जो साहित्य में केवल कहानी नहीं, बल्कि अनुभव खोजते हैं; जो प्रकृति में केवल दृश्य नहीं, बल्कि अर्थ देखते हैं; जो मौन में खालीपन नहीं, बल्कि संवाद सुनते हैं।

यह कृति उन लोगों के लिए भी है जिन्होंने कभी भीड़ के बीच स्वयं को अकेला पाया है, जिन्होंने अपने जीवन के किसी मोड़ पर ठहरकर स्वयं से प्रश्न किया है, या जिन्होंने कभी यह महसूस किया है कि संसार की उपलब्धियों के बावजूद भीतर कोई शिखर अभी भी अधूरा है।

यह पुस्तक किसी एक धर्म, विचार या उत्तर को स्थापित करने का प्रयास नहीं करती।

यह एक यात्रा प्रस्तुत करती है—

मनुष्य से मनुष्य तक,
मनुष्य से प्रकृति तक,
प्रकृति से मौन तक,
और मौन से स्वयं तक।

अंततः कैलाश: एक शिखर, एकांत’ उस यात्रा का साहित्यिक रूप है जिसमें एक पर्वत बाहर दिखाई देता है, लेकिन उसकी वास्तविक चढ़ाई भीतर होती है।

क्योंकि हर मनुष्य के भीतर एक कैलाश है।

एक ऐसा शिखर जहाँ पहुँचने के लिए कदमों से अधिक आवश्यक है—
मौन।

और उस मौन में स्वयं को सुनने का साहस।

कैलाश एक शिखर है।
एकांत उसकी ऊँचाई है।
और स्वयं की खोज—उसकी यात्रा।

About the Author

मनीष खत्री हिंदी के रचनाकार हैं, जिनकी लेखनी आध्यात्मिक चिंतन, मानवीय संवेदना, विश्वास और आत्मपरिवर्तन के विषयों को केंद्र में रखती है। उनकी रचनात्मक दृष्टि में कहानी केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर किसी विचार, प्रश्न या चेतना को जन्म देने का माध्यम है।

उनका लेखन जीवन के उन पक्षों को स्पर्श करता है जहाँ आस्था और तर्क, विश्वास और संदेह, सेवा और स्वार्थ, अहंकार और आत्मबोध एक-दूसरे के सामने आते हैं। वे अपने पात्रों के माध्यम से मानवीय व्यवहार और संबंधों की जटिलताओं को सरल, भावनात्मक और प्रेरक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं।

‘कैलाश: एक शिखर, एकांत’ उनकी इसी रचनात्मक दृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाली काल्पनिक कृति है। इस पुस्तक में वे ‘कैलाश’ नामक केंद्रीय पात्र के माध्यम से निःस्वार्थ सेवा, आध्यात्मिक विश्वास, मानवीय संबंधों, सामाजिक प्रतिष्ठा, विश्वासघात, संघर्ष और अंततः आंतरिक परिवर्तन की यात्रा को सामने लाते हैं। पुस्तक में कैलाश केवल एक पात्र नहीं, बल्कि विश्वास, मानवता और आत्मिक ऊँचाई का प्रतीक बनकर उभरता है।

मनीष खत्री का मानना है कि प्रत्येक कहानी अपने भीतर एक नई चेतना, एक नई प्रेरणा और जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण रखती है। उनकी लेखनी का उद्देश्य पाठक को केवल कथा से जोड़ना नहीं, बल्कि उसे स्वयं से, अपने विश्वासों और अपने भीतर मौजूद मानवीय मूल्यों से जोड़ना है।

उनकी रचनात्मक यात्रा का मूल स्वर है—मानवता, विश्वास, आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन।

Book Details

Publisher: The Versified Motive
Number of Pages: 100
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

Ratings & Reviews

Kailash: Ek Shikhar Ekant

Kailash: Ek Shikhar Ekant

(Not Available)

Review This Book

Write your thoughts about this book.

Currently there are no reviews available for this book.

Be the first one to write a review for the book Kailash: Ek Shikhar Ekant.

Other Books in Religion & Spirituality, Sapiential Novel

Shop with confidence

Safe and secured checkout, payments powered by Razorpay. Pay with Credit/Debit Cards, Net Banking, Wallets, UPI or via bank account transfer and Cheque/DD. Payment Option FAQs.