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माफ़ करना इतना कठिन क्यों?
माफ़ी—एक छोटा-सा शब्द, लेकिन इसके पीछे छिपी भावनाएँ अक्सर बहुत बड़ी होती हैं।
क्या माफ़ कर देना सच में भूल जाना है?
क्या हर गलती माफ़ी के लायक होती है?
और अगर किसी को माफ़ कर भी दिया जाए, तो रिश्ते पहले जैसे क्यों नहीं हो पाते?
यह किताब माफ़ी को सही या गलत साबित करने की कोशिश नहीं करती। यह उन सवालों के भीतर उतरने की कोशिश है, जिनका सामना हम कभी न कभी अपने रिश्तों में करते हैं।
कुछ कहानियाँ टूटे हुए भरोसे की हैं, कुछ उन घावों की जो समय के साथ भी पूरी तरह नहीं भरते। कुछ माफ़ियाँ देर से मिलती हैं, कुछ कभी मिलती ही नहीं। और कभी-कभी सबसे कठिन माफ़ी किसी और को नहीं, बल्कि खुद को देनी पड़ती है।
माफ़ करना क्या सच में भूल जाना है?
क्या हर माफ़ी स्वीकार करना ज़रूरी है?
और क्या ठीक होने का मतलब पहले जैसा हो जाना है?
शायद इन सवालों के जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग होंगे।
यह किताब कोई फैसला नहीं सुनाती।
बस आपको अपने भीतर झाँकने के लिए कुछ सवाल देती है।
शायद इन पन्नों में आपको किसी और की कहानी न मिले...
लेकिन हो सकता है, इनमें आपको अपना ही कोई हिस्सा मिल जाए।
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