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दिखाया नहीं, तो जाना नहीं।
जाना नहीं, तो समझ अधूरी।
समझ अधूरी, तो विचार अधूरा।
विचार अधूरा, तो सुधार अधूरा।
सुधार अधूरा, तो परिवर्तन अधूरा।
क्या इस क्रम की हर कड़ी को अलग से परखना आवश्यक है?
'योगदान' प्रश्नों और विचारों की एक यात्रा है। यह पुस्तक किसी विचार, विश्वास या निष्कर्ष को अंतिम मानकर नहीं चलती। इसका केंद्र मनुष्य है—उसका आचरण, विवेक और उसकी संभावनाएँ।
विश्वास, धर्म, शिक्षा, ज्ञान, चेतना, बोध, कार्य, जिम्मेदारी, जवाबदेही, सम्मान, समर्थन, माता-पिता, विरासत और योगदान जैसे विषयों को उनके संदर्भ और आधार के साथ देखा गया है। यहाँ तर्क को प्रमाण नहीं माना गया और निष्कर्ष को अंतिम सत्य नहीं बनाया गया।
यह पुस्तक तैयार उत्तर देने के बजाय पाठक को अपने विश्वासों और विचारों के आधार पर प्रश्न करने, उन्हें जाँचने और आवश्यकता पड़ने पर संशोधित करने का अवसर देती है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो उत्तर से पहले प्रश्न को देखना चाहते हैं।
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