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"मौन का शोर: पन्नों पर सिसकते रिश्ते" आधुनिक डिजिटल युग की चकाचौंध के बीच मानवीय संवेदनाओं, टूटते-जुड़ते रिश्तों और अकेलेपन की गहरी परतों को टटोलती कविताओं का एक अनूठा संग्रह है।
हम तकनीक के ज़रिए पूरी दुनिया से जुड़ते चले गए, लेकिन हमारे अपने लोग कहीं पीछे छूट गए। यह संग्रह बुजुर्गों की प्रतीक्षा, माँ की ममता, पिता की चुप्पी, बचपन की मासूमियत और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अनकहे एहसासों को कागज़ पर उतारता है। इसमें कुल 24 संवेदनशील कविताएँ शामिल हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर देंगी कि— तकनीक सुविधा हो सकती है, लेकिन संवेदना ही असली जीवन है।
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