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मैं कौन हूूँ एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर केवल कुछ आत्मज्ञानी ही जानते हैं. मोही नैय्यर ने यह प्रश्न पूछ कर अपनी अज्ञानता को पहचाना. इसके उत्तर में इस सृष्टि में व्याप्त चेतन और जड़ तत्वों को समझने का प्रयास किया. परिणाम स्वरूप उसे मैं के अस्तित्व की तुच्छता का आभास हुआ.
छोटे से जीवन की झलकियों ने यह संदेश दिया कि अहंकार वश मैं पर अपनी ससीम योग्यताओं, क्षमताओं, और प्रभु प्रदत्त सभी आशीर्वादों को नष्ट करना न तो स्वहित और न ही स्वार्थ की सार्थकता हेतु उचित है.
आत्म ध्वनि ने कहा, ‘‘अपने मैं के अस्तित्व को भूल कर स्वधर्म अथवा कर्तव्य कर्मों को करते हुए सृष्टि चक्र संचालन में प्रभु के सहयोगी बनों. मैं का अस्तित्व अर्थात अहंकार नष्ट हो जाएगा. तुम में निहित सत् का अस्तित्व स्वयंमेव प्रकट हो जाएगा.’’
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