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बास्करन मुदलियार एक सफल उद्योगपति था: अपनी फ़ैक्ट्री, अपने कर्मचारियों और अपने परिवार के साथ एक स्थिर ज़िंदगी जीता हुआ। फिर लॉकडाउन आया। फ़ैक्ट्री पर ताला लगा, दो करोड़ का क़र्ज़ सिर पर आ गया, और पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकती चली गई।
इंडोनेशिया में दो साल की मजबूरी भरी दूरी, लौटने के बाद बंद दरवाज़ों वाली नौकरी की तलाश, और फिर दिल्ली में एक एजेंट का वादा: विदेश में बड़ी तनख़्वाह, बस दस लाख रुपये और थोड़ा-सा भरोसा। मॉस्को पहुँचते ही नौकरी की जगह बदल जाती है, ख़र्च का कार्ड किसी और के नियंत्रण में निकलता है, और आधी रात की एक ट्रेन उसका इंतज़ार कर रही होती है।
उस रात उसके कानों में सिर्फ़ एक आवाज़ गूँजती है, उषा की: “अभी ट्रेन में मत बैठो।”
और जब एक शिकायत की जाँच शुरू होती है, तो सामने आता है ऐसा सच, जो सिर्फ़ उसका नहीं था।
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