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मन को एकाग्रचित्त कर ध्यान को जब भगवान में लगाने की कोशिश करता हूँ , तो कुछ और करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उस शून्य में तो जैसे प्रेम का ही संसार बसा हो। उस संसार में प्रवेश करने के पश्चात तो जैसे सृजन शक्ति का एक असीम प्रवाह तन मन और बुद्दि में प्रवाहित होने लगता है। विचारों का प्रवाह टूटने का नाम नहीं लेता और लेखनी रुकने का नाम नहीं लेती है। इसलिए मन बार-बार कहने को होता है कि प्रेम से बड़ी शक्ति इस संसार दूसरी कोई नहीं है। प्रेम अभिव्यक्ति है परमात्मा का, प्रेम शक्ति है सृजन का, प्रेम मार्ग है संसार के समस्त सुखों के प्राप्ति का।
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