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सनातन अयोध्या खंड–2: रामजन्मभूमि की रक्षा में वैष्णव बैरागी अखाड़ों का योगदान एक शोधपरक ऐतिहासिक ग्रंथ है, जिसमें अयोध्या की वैष्णव बैरागी परंपरा, अखाड़ों, छावनियों, संतों और महंतों की संस्थागत उपस्थिति तथा रामजन्मभूमि से जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम का दस्तावेजी अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
इस ग्रंथ में 1855 के हनुमानगढ़ी संघर्ष से लेकर 1949 के अभिलेखों, 1986 के न्यायालयीन घटनाक्रम, 1989 के शिलान्यास, 1990 के कारसेवा, 1992 की निर्णायक घटना, 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय और 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तक उपलब्ध दस्तावेजों और न्यायिक अभिलेखों के आधार पर घटनाओं को समझने का प्रयास किया गया है।
पुस्तक में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की भूमिका को केवल परंपरागत कथनों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों, न्यायालयीन दस्तावेजों, सरकारी सामग्री, ऐतिहासिक स्रोतों और मौखिक इतिहास के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। मौखिक साक्ष्यों को उनके स्रोत और स्वरूप के साथ अलग से रखा गया है, ताकि प्रमाणित दस्तावेज और परंपरागत स्मृति एक-दूसरे के स्थान पर न रखे जाएँ।
इस शोध का मूल सिद्धांत है—“जहाँ दस्तावेज बोलते हैं, वहाँ इतिहासकार को अपनी आवाज धीमी कर देनी चाहिए।”
यह ग्रंथ अयोध्या, रामजन्मभूमि, वैष्णव बैरागी अखाड़ों और भारतीय धार्मिक-सामाजिक इतिहास का अध्ययन करने वाले पाठकों, शोधार्थियों तथा इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए तैयार किया गया है।
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