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मनुष्य ही एकमात्र ऐसी प्रजाति क्यों है जो अपनी ही बनाई हुई समस्याओं से जूझ रही है?
पदार्थ अपनी प्रकृति का पालन करते हैं।
पौधे अपनी प्रकृति का पालन करते हैं।
पशु अपनी प्रकृति का पालन करते हैं।
फिर मनुष्य अलग क्यों दिखाई देता है?
अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद भी मानवता आज संघर्ष, तनाव, असमानता, पर्यावरण विनाश और सुख की अंतहीन खोज में उलझी हुई है।
Beyond Human Laws एक सरल, फिर भी गहन संभावना प्रस्तुत करती है— क्या मानवता की अधिकांश बड़ी समस्याएँ वास्तव में अलग-अलग समस्याएँ नहीं, बल्कि जीवन को संचालित करने वाले प्राकृतिक नियमों से हमारे गहरे विच्छेद के लक्षण हैं?
यह कोई मान्यताओं या विश्वासों की पुस्तक नहीं है।
यह एक निमंत्रण है— देखने का।
स्वतंत्र रूप से सोचने का।
और शायद यह खोजने का कि जिन उत्तरों की हम तलाश कर रहे हैं, वे हमेशा से हमारी आँखों के सामने थे।
अपनी यात्रा जारी रखें @BeyondHumanLaws
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