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**तृष्णा शांत हुई? — तुम आए तो हुई**
कुछ प्रेम कहे नहीं जाते… बस जीए जाते हैं।
*तृष्णा शांत हुई?* केवल एक प्रेमकथा नहीं, बल्कि स्मृतियों, संबंधों, आत्मीयता, विरह और मनुष्य के भीतर छिपी उस गहरी तृष्णा की कहानी है, जो किसी को पाने से अधिक किसी से जुड़ने, समझे जाने और स्वयं को पहचानने की आकांक्षा से जन्म लेती है।
अन्वेष, एक छोटे से गाँव का शांत और संवेदनशील युवक, काशी की गलियों से विज्ञान की जटिल दुनिया तक एक असाधारण यात्रा तय करता है। नियरा, तिश्या और नक्ष के साथ उसकी दोस्ती, सपने, संघर्ष, बिछोह और जीवन के कठिन प्रश्न उसके व्यक्तित्व और संबंधों को लगातार नए अर्थ देते हैं।
बनारस के घाट, गंगा की धारा, युवावस्था के सपने, विज्ञान की खोज, परिवार, प्रेम, वियोग और पुनर्मिलन—इन सबके बीच यह उपन्यास पाठक को उस प्रश्न तक ले जाता है जो शायद हर मन में कहीं न कहीं जीवित रहता है: क्या हमारी सबसे गहरी तृष्णा उपलब्धियों से शांत होती है, या किसी सच्चे संबंध से?
भावनात्मक, चिंतनशील और मानवीय संवेदनाओं से भरा यह उपन्यास प्रेम और जीवन को केवल घटना नहीं, बल्कि एक आंतरिक यात्रा के रूप में देखता है।
**उन पाठकों के लिए जो प्रेम, संबंधों, आत्म-खोज, बनारस की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और भावनात्मक साहित्य पसंद करते हैं।**
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