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क्या विज्ञान हमें ब्रह्मांड तक ले जा सकता है—बिना यह सिखाए कि वहाँ पहुँचकर हमें मनुष्य कैसे बने रहना है?
9•5•1 एक वैज्ञानिक-आध्यात्मिक उपन्यास है, जहाँ आधुनिक विज्ञान, मानवीय चेतना और भारतीय दार्शनिक स्मृति एक ही कथा में मिलते हैं।
जब मानवता पृथ्वी की सीमाओं से आगे बढ़कर नवग्रहों तक अपना विस्तार करती है, उसकी तकनीकी शक्ति अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक पहुँच जाती है। लेकिन एक रहस्यमय विकिरण संकट मानव सभ्यता के सामने ऐसा प्रश्न रखता है जिसका उत्तर केवल विज्ञान के पास नहीं है।
नवग्रह। पंचतत्व। एक मानवता।
शक्ति, पदार्थ, जीवन, चेतना और मानवीय संबंधों के बीच छिपी परस्पर निर्भरता धीरे-धीरे सामने आने लगती है। पात्रों की व्यक्तिगत यात्राएँ एक बड़ी सभ्यतागत खोज से जुड़ती हैं—क्या प्रगति केवल अधिक शक्ति प्राप्त करने का नाम है, या उस शक्ति के साथ हमारी जिम्मेदारी और प्रज्ञा का बढ़ना भी आवश्यक है?
विज्ञान और अध्यात्म को विरोधी ध्रुव मानने के बजाय, 9•5•1 उनके बीच संवाद स्थापित करता है।
यह उपन्यास अंततः कुछ सरल लेकिन गहरे प्रश्न पूछता है:
हमें क्या चाहिए? कितना पर्याप्त है? कौन-सा प्रमाण हमारा विचार बदल सकता है? और एक साझा भविष्य में हम एक-दूसरे के प्रति क्या उत्तरदायित्व रखते हैं?
ब्रह्मांड विशाल हो सकता है। ग्रह अनेक हो सकते हैं। संस्कृतियाँ और भाषाएँ अलग हो सकती हैं।
लेकिन मानवता एक है।
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