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"दिल का रिश्ता" यह नाम मैंने इसलिए नहीं चुना क्योंकि यह सुंदर लगता है। यह नाम इसलिए चुना गया क्योंकि यही सच है।
इस कहानी की नींव में एक सवाल है क्या रिश्ते बनाने के लिए ख़ून का होना ज़रूरी है?
अनुसुइया ने जवाब दिया नहीं। ख़ुशी ने जवाब दिया नहीं। और ख़ुशी महल के हर बच्चे ने, हर दिन, यही जवाब जिया।
हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ लोग अकेले हैं भीड़ में भी। जहाँ बच्चे बेघर हैं , शहर में भी। जहाँ माँ का प्यार मिलना नसीब की बात मानी जाती है।
पर हर अनुसुइया यह साबित करती है कि प्यार देने के लिए जन्म देना ज़रूरी नहीं, बस दिल का होना काफ़ी है।
यह कहानी यहाँ ख़त्म होती है, पर ख़ुशी महल में हर रोज़ एक नई कहानी शुरू होती है।
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