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“भिलाई: सायरन की धड़कन” एक औद्योगिक शहर की आत्मा को समझने का प्रयास है। यह उपन्यास केवल भिलाई स्टील प्लांट की भट्ठियों और मशीनों की कथा नहीं, बल्कि उन लोगों की कहानी है जिनकी साँसों से शहर जीवित रहता है। हर सुबह सायरन की गूँज के साथ जागने वाला यह नगर श्रम, अनुशासन और सामूहिक जीवन की लय पर चलता है ।
सेक्टर-4 की गली नंबर 17 इस कथा का केंद्र है—जहाँ अलग-अलग आस्थाओं, भाषाओं और परंपराओं के लोग साथ रहते हैं। उनकी प्रार्थनाएँ भिन्न हो सकती हैं, पर उनकी सुबहें एक हैं और उनकी चिंताएँ साझा। उद्योग की बदलती नीतियाँ, वेतन-बोनस की प्रतीक्षा, नई मशीनों का आगमन, अफवाहों की हलचल और सामाजिक संतुलन की परीक्षा—इन सबके बीच यह उपन्यास मानवीय संबंधों की गहराई को उभारता है ।
यह कथा इस प्रश्न को उठाती है—क्या किसी शहर की असली शक्ति उसकी फैक्ट्रियों में होती है या उसके लोगों में? जब भट्टी में लोहा तपता है, तो उसके साथ मनुष्य का धैर्य, जिम्मेदारी और विश्वास भी तपता है।
“भिलाई: सायरन की धड़कन” औद्योगिक भारत के सामाजिक यथार्थ का संवेदनशील चित्रण है—जहाँ काम केवल रोजगार नहीं, बल्कि अस्तित्व की रीढ़ है।
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