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पुस्तक परिचय — ‘प्रहुति’
लेखक: प्रमोद रामावत ‘प्रमोद’
‘प्रहुति’ — जीवन-संघर्ष, आध्यात्मिक अनुभूतियों और दादा-पौत्री के निश्छल प्रेम की भावपूर्ण आत्मकथ्यात्मक उपन्यास-कृति।
प्रमोद रामावत ‘प्रमोद’ की कृति ‘प्रहुति’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, संघर्षों, आस्था, पारिवारिक संबंधों और भावनात्मक संवेदनाओं का ऐसा दस्तावेज़ है, जिसमें लेखक ने अपने जीवन की यात्रा को आत्मीयता के साथ शब्दों में पिरोया है।
इस पुस्तक में लेखक के जीवन के विभिन्न पड़ावों, संघर्षों, आध्यात्मिक अनुभवों तथा जादूगर के रूप में वर्ष 1973 से 1984 तक की यात्रा के साथ-साथ शिक्षण, पत्रकारिता और अस्पताल सेवा से जुड़े अनुभवों की झलक मिलती है। जीवन के इन विविध अनुभवों के बीच परिवार, संबंधों और मानवीय संवेदनाओं का विशेष स्थान है।
इस कृति का सबसे भावपूर्ण पक्ष है लेखक की तेरह माह की पौत्री प्रहुति के प्रति उनका वात्सल्य। प्रहुति का जन्म लेखक और उनके परिवार के लिए आनंद, आशा और कृतज्ञता का विशेष अवसर बना। लेखक ने अपनी पौत्री को परम सत्ता का अनुपम उपहार मानते हुए उसके नाम को अपनी भावनाओं, आस्था और पारिवारिक स्मृतियों से जोड़ा है।
‘प्रहुति’ शब्द का अर्थ उत्तम होम बताया गया है। जिस प्रकार होम की पूर्णाहुति एक पवित्र भाव से जुड़ी होती है, उसी प्रकार यह पुस्तक लेखक के जीवनानुभवों, पारिवारिक प्रेम और आध्यात्मिक अनुभूतियों की एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति है।
यह रचना पाठक को जीवन के संघर्षों के बीच आशा बनाए रखने, परिवार के महत्व को समझने और अपने अनुभवों को अगली पीढ़ी के लिए सहेजकर रखने की प्रेरणा देती है। इसमें दादा का अपनी पौत्री के प्रति प्रेम केवल वर्तमान का भाव नहीं, बल्कि भविष्य के लिए सुरक्षित की गई एक आत्मीय स्मृति भी है।
‘प्रहुति’ उन पाठकों के लिए विशेष रुचिकर है, जो आत्मकथ्यात्मक साहित्य, जीवन-संघर्ष, आध्यात्मिक अनुभवों, पारिवारिक रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी रचनाएँ पढ़ना पसंद करते हैं।
लेखक प्रमोद रामावत ‘प्रमोद’ ने इस कृति के माध्यम से अपने जीवन के अनुभवों को शब्द देते हुए अपनी प्रिय पौत्री के लिए स्नेह, आशीर्वाद और स्मृतियों की एक अनमोल धरोहर प्रस्तुत की है।
पुस्तक: प्रहुति
विधा: आत्मकथ्यात्मक उपन्यास
लेखक: प्रमोद रामावत ‘प्रमोद’
संपादक: नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
प्रथम संस्करण: दीपोत्सव, 2014
नवीन द्वितीय संस्करण: 2026
‘प्रहुति’ — अनुभवों से जन्मी अभिव्यक्ति, आस्था से जुड़ी अनुभूति और दादा के हृदय से पौत्री के नाम लिखी गई प्रेमपूर्ण स्मृति।
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