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चेतना का विद्रोह" — आज की भाग-दौड़ भरी, शोर-शराबे वाली दुनिया के बीच खड़े एक युवा मन की गहरी और प्रामाणिक वैचारिक यात्रा है।" क्या जीवन का मतलब बस एक अच्छी नौकरी, वीकेंड पार्टियाँ, EMI भरना और इसी दौड़ में मर जाना है? रात के उस एकांत में जब स्क्रीन की रोशनी बुझती है, तो भीतर क्या मिलता है? एक अजीब सा खालीपन... एक गहरी बेचैनी। यह किताब उसी एक बेचैन सवाल का पीछा करने की कहानी है। इस पुस्तक के मुख्य खंड और उनके मर्म: मुखौटों के पार - प्रकृति और वासना का सच: समाज के पाखंडी मुखौटों को उतारकर, खजुराहो और कोणार्क के पत्थरों के दार्शनिक मर्म और प्राचीन तंत्र-विज्ञान के वास्तविक स्वरूप का बेबाक विश्लेषण। मन की परछाई - अंधेरे का मनोविज्ञान: इंसान के भीतर क्रूरता, भय और पीड़ित मानसिकता (Victim Mindset) का जन्म कहाँ होता है? डिजिटल मायाजाल, एल्गोरिदम और आज की पीढ़ी की डोपामाइन की गुलामी का गहरा मनोवैज्ञानिक एक्स-रे। प्रकाश का मार्ग - रूपांतरण का विज्ञान: आदि गुरु शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन, प्राचीन गुरुकुल पद्धति के मर्म और आधुनिक जीव विज्ञान (Biology) का एक अद्भूत समन्वय, जो 'बायो-स्पिरिचुअलिटी' के ज़रिए संस्कारों और जींस के रहस्यमयी खेल को समझाता है। यह पुस्तक आपको सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं देती, बल्कि यह उस 'मानसिक सर्जरी' का खुला नक्शा है जो आपको आपकी 'स्वतंत्र इच्छा' (Free Will) से मिलवाएगी। यदि आप अपनी पुरानी सामाजिक प्रोग्रामिंग को तोड़कर इस अस्तित्व के 'सचेत सह-निर्माता' बनने का साहस रखते हैं... तो यह खोज आपके लिए है।
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