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**हर पिता की अपनी एक कहानी होती है। लेकिन क्या हम कभी उन आँसुओं को देख पाते हैं, जिन्हें वह चुपचाप अपने भीतर छिपा लेता है?**
बेंगलुरु में पैंतीस वर्षों तक नौकरी करने के बाद जब राम सेवानिवृत्त होते हैं, तो उनकी पत्नी लक्ष्मी परिवार और दोस्तों के साथ उनके लिए एक विशेष समारोह आयोजित करती हैं।
उनकी बेटी लावण्या के लिए पिता हमेशा एक शांत, ज़िम्मेदार और भरोसेमंद इंसान रहे हैं। उसे लगता है कि उसके पिता ने एक स्थिर और सुखद जीवन जिया है।
लेकिन उस शाम, जब लक्ष्मी अपने पति के अतीत की यादें साझा करना शुरू करती हैं, तो लावण्या के सामने एक ऐसी दुनिया खुलती है, जिससे वह अब तक अनजान थी।
पंद्रह वर्ष की उम्र में अपना गाँव छोड़कर बेंगलुरु पहुँचे एक लड़के की यात्रा, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ, अनकहे डर, मुश्किल समय में मिले अच्छे लोग और जीवन के छोटे-छोटे सुख—इन सबके बीच लावण्या धीरे-धीरे अपने पिता को एक नए रूप में समझने लगती है।
**वे आँसू जिन्हें हमने अनदेखा किया** पिता के त्याग की कहानी भर नहीं है। यह प्रेम, परिवार, कृतज्ञता और अपने सबसे करीबी लोगों को केवल उनकी ज़िम्मेदारियों से नहीं, बल्कि उनकी भावनाओं, सपनों और इच्छाओं से भी पहचानने की एक हृदयस्पर्शी कहानी है।
**जिस पिता को हम हमेशा से जानते आए हैं, उसके भीतर भी एक इंसान है, जिसकी पूरी कहानी शायद हमने कभी सुनी ही नहीं।**
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