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पुनश्च राध - फिर राधा होना।
पुनश्च राध एक आधुनिक स्त्री का आत्मबोध है, उसकी बाहर और भीतर की निरन्तर चलती यात्रा। इस यात्रा में मिलन की ऊष्मा है, वियोग का ताप है, समय की चुनौतियों की चुभन है, आत्मबल का सुखद लेप है। फिर इस राधा होने में कृष्ण कहाँ? कृष्ण है — कभी प्रेमी है, कभी मित्र, कभी सहयात्री, कभी मार्गदर्शक,और कभी कहीं नहीं।
पुनश्च राध स्त्री मन की सभी सूक्ष्म धाराओं को प्रवाहित करता है। यह काव्य कृति पाठक को एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जो कोमल है, गहन है, सघन है, निर्मल है —बिल्कुल राधा होने की तरह।
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