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एक लेखक के तौर पर जब मैंने इस विषय पर कलम उठाने का निश्चय किया, तो मेरे मन में अकादमिक ज्ञान का प्रदर्शन करने की इच्छा नहीं थी, बल्कि एक गहरी मानवीय संवेदना और छटपटहट थी। मैंने अपने आस-पास, समाज के भीतर, और समाचारों की सुर्खियों में उस मौन पीड़ा को महसूस किया है, जो अंततः किसी व्यक्ति को जीवन से विमुख होने के कगार पर ले आती है। आत्महत्या पर बात करना आज भी हमारे समाज में एक वर्जित विषय (taboo) माना जाता है। इस पर एक अजीब सी चुप्पी है, एक अनकहा भय है जो हमें इस शब्द को ज़ुबान पर लाने से भी रोकता है।
मेरा उद्देश्य इसी चुप्पी की दीवारों को तोड़ना है। इस पुस्तक को लिखने का प्रयोजन किसी न्यायाधीश की तरह बैठकर यह तय करना नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत, बल्कि एक दोस्त, एक हमदर्द की भूमिका में उस असहनीय दर्द को समझने और साझा करने का प्रयास करना है, जिससे गुज़र रहा व्यक्ति आत्महत्या जैसे अंतिम कदम के बारे में सोचने पर विवश हो जाता है। यह पुस्तक उन अनगिनत कहानियों को एक आवाज़ देने का प्रयास है जो समाज के डर से कभी कही नहीं गईं। यह उन सिसकियों को सुनने की एक कोशिश है जो बंद दरवाज़ों के पीछे हमेशा के लिए दफ़न हो गईं। मेरा मानना है कि हर जीवन बहुमूल्य है और हर पीड़ा को सुना जाना चाहिए। जब हम दर्द को नाम देते हैं, उसे स्वीकार करते हैं, तभी हम उपचार की दिशा में पहला कदम बढ़ाते हैं।
मैं आपसे, अपने पाठक से, सीधे संवाद करना चाहता हूँ। यदि आप यह पुस्तक इसलिए पढ़ रहे हैं क्योंकि आप स्वयं जीवन की किसी कठिन चुनौती से गुज़र रहे हैं, तो मैं चाहता हूँ कि आप जानें कि आप अकेले नहीं हैं। यह पुस्तक आपके भीतर उम्मीद जगाने के लिए है। यह आपको यह बताने के लिए है कि हर सुरंग के दूसरे छोर पर रोशनी होती है, और उस रोशनी तक पहुँचना संभव है। यह मृत्यु का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि जीवन की ओर लौटने का एक निमंत्रण है। आइए, इस यात्रा पर एक साथ चलें।
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