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क्या आप अपने ही दिमाग पर भरोसा कर सकते हैं?मायरा की ज़िंदगी बिल्कुल सामान्य चल रही थी, जब तक कि उसकी रातों का सुकून एक अनजान वॉयस नोट ने नहीं छीन लिया। हर रात ठीक 11:11 बजे, उसके फोन की स्क्रीन चमकती है और एक ऐसी खौफनाक डिजिटल आवाज़ गूंजती है जो उसके आने वाले कल की सटीक भविष्यवाणी करती है।सुबह उठकर अलार्म से पहले आँख खुलना और पसंदीदा सफेद कप का हाथ से छूटकर टूट जाना... वॉयस नोट में कही हर एक बात सच साबित होने लगती है। डर और पागलपन की हद तक पहुँच चुकी मायरा जब अपने मंगेतर कबीर और बेस्ट फ्रेंड रोहन की मदद से इस अदृश्य साए को बेनकाब करने निकलती है, तो कानून की चौखट पर एक ऐसा खौफनाक सच उसका इंतज़ार कर रहा होता है जो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसका देता है।क्या यह कोई बाहरी साज़िश है, या मायरा के अपने ही दिमाग की कोई गहरी 'दरार'?एक ऐसी साइकोलॉजिकल थ्रिलर जो आख़िरी पन्ने तक आपके होश उड़ा देगी। रुचि शर्मा के पहले उपन्यास 'दरार' के इस माइंड-गेम में आपका स्वागत है!
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