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"कुछ रिश्ते मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं, सिर्फ़ किसी के आसमान को सलामत रखने के लिए छोड़ दिए जाते हैं..."
हर प्रेम मुकद्दर के पन्नों पर मिलन की स्याही से नहीं लिखा जाता; कुछ दास्तानें सिर्फ़ खामोशी और समर्पण की शहादत मांगती हैं।
'अनायास' कॉलेज की शांत पगडंडियों, लाइब्रेरी की गूंजती खामोशियों और पुराने तालाब के किनारे पन्नों पर उतरती एक ऐसी रूहानी गाथा है, जहाँ प्रेम शब्दों या वादों का मोहताज नहीं था। लेकिन जब सामाजिक हैसियत, अनचाहे रिश्ते और रसूख की दीवारें सामने आकर खड़ी हुईं, तो अपने प्रेम पर किसी हक या ज़िद के बजाय चुना गया एक निष्कलंक, मूक त्याग।
क्या प्रेम का अर्थ सिर्फ़ पा लेना ही है? या किसी की खुशियों की ख़ातिर खुद को चुपचाप विदा कर देना ही उसका सबसे पावन रूप है?
एक तरफ़ बजती शहनाई, दूसरी तरफ़ बिखरते नीले फूल और उस सर्द पगडंडी पर छूटते अधूरे कदमों के निशाँ... 'अनायास' मानवीय गरिमा, समर्पण और उस मूक दर्द की अमर दास्तान है जो विरह में भी पावन रहती है।
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