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क्या आपने कभी सोचा है कि बिना मांगी सलाह सुनते ही मन में गुस्सा, चिढ़ या बेचैनी क्यों पैदा हो जाती है? क्यों कुछ लोग हर बात में अपनी राय देना अपना अधिकार समझते हैं, और क्यों हम अक्सर सही सलाह भी सिर्फ इसलिए ठुकरा देते हैं क्योंकि किसी ने उसे हम पर थोप दिया?
"तुमसे पूछा किसने?" सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि इंसानी व्यवहार, रिश्तों और आत्मसम्मान की गहराइयों में उतरने वाली एक मनोवैज्ञानिक यात्रा है।
यह किताब बिना मांगी सलाह के पीछे छिपे अहंकार, असुरक्षा, नियंत्रण की इच्छा, सामाजिक दबाव और मानसिक प्रक्रियाओं को सरल भाषा में समझाती है। परिवार, दोस्ती, विवाह, कार्यस्थल और सोशल मीडिया—हर जगह मिलने वाली अनचाही सलाह कैसे रिश्तों को धीरे-धीरे कमजोर करती है, यह पुस्तक वास्तविक जीवन के उदाहरणों और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के माध्यम से स्पष्ट करती है।
यदि आप अपनी सीमाएँ तय करना चाहते हैं, बेहतर निर्णय लेना चाहते हैं, आत्मसम्मान के साथ जीना चाहते हैं और यह समझना चाहते हैं कि कब सलाह स्वीकार करनी चाहिए और कब विनम्रता से उसे अनदेखा कर देना चाहिए, तो यह पुस्तक आपके लिए है।
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