You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
रेवाखंड में सुबह सबसे पहले पानी जागता है। घाट की सीढ़ियों पर निशान-पत्थर खड़ा है, और पहली बाढ़ की रात अब केवल ग्यारह दिन दूर।
इरावती बही-घर की रखवाली है। उसके पास पिता की छोड़ी परछाईं-बही है, जिसमें हर उधार लिखा जाता है - और इस शहर में उधार पैसे का नहीं, परछाईं का होता है। एक रात या एक मौसम के लिए उधार ली गई परछाईं लौटनी बाक़ी रह जाए, तो वह कहाँ रहती है, यह बही के कटे पन्ने जानते हैं।
फिर शहर में वह आता है जिसकी दोपहर में परछाईं नहीं होती। तहसील का नक्शा, बंद संदूक, बाईस नामों वाली सूची, और नदी के बीच एक डूबा हुआ गाँव - इरावती को पहली बार अपनी बही के उन पन्नों को खोलना है जिन्हें पिता ने कभी खोलने का साहस नहीं किया।
उधार की परछाईं भरोसे, हिसाब और पूछने की हिम्मत की कथा है। कुछ लेखे चुकाने से नहीं, पूछने से तय होते हैं।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book उधार की परछाईं.