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बेतिया के पुराने डाकघर में नंदिनी चौधरी हर सुबह दूसरों की चिट्ठियाँ छाँटती है। एक दिन लाल डाकपेटी के नीचे उसे अपने नाम का नीला लिफ़ाफ़ा मिलता है। उस पर लगी तारीख़ उसके जन्म से पहले की है। भीतर की लिखावट उसकी अपनी जैसी है।
लिखने वाली का दावा है कि वह बारह वर्ष बाद की नंदिनी है। वह पिता की मृत्यु के बारे में ऐसा सवाल उठाती है जिसे नंदिनी ने कभी पूछने की जरूरत नहीं समझी थी।
अब एक पुराने रजिस्टर की कटी हुई पंक्ति, किसी का अधूरा जवाब और घर में सँभाली गई यादें उसे अलग-अलग दिशाओं में खींच रही हैं। हर नई चिट्ठी कुछ बताती है, कुछ छिपाती है। अपने सवालों के साथ आगे बढ़ते हुए उसे उन लोगों का सामना भी करना है जिनसे वह मदद माँग रही है।
अगर बीता हुआ दिन बदल सकता हो, तो क्या सिर्फ़ अपना दुःख मिटाना काफी है?
कल की चिट्ठी स्मृति, भरोसे और समय से उलझती एक स्त्री की कथा है, जो अपने पिता को समझने निकलती है और दूसरों के जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भी जूझती है।
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