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बारह पन्नों का एक पत्र। एक भाषा जिसे बहुत कम लोग पढ़ सकते हैं। और एक अनुवादक, नीलांबर, जो इस काम के लिए एक ऐसी घाटी में बुलाया जाता है जहाँ घंटी हर दिन नहीं बजती।
हर किसी के पास एक कथन है। बहुत कम के पास प्रमाण। हर पंक्ति में एक चुनाव है, और हर चुनाव के पीछे कोई है जिसने पहले भी चुना था।
कितना पढ़ा जाए, और कितना जो नहीं लिखा गया, उसे भी सुना जाए? जब बर्फ़ रास्ते बंद कर दे, तो सबसे पास की सच्चाई भी कहाँ तक पहुँचती है?
तीसरा पाठक, एक धीमी, गहरी रहस्य-कथा, उनके लिए जो उत्तर से ज़्यादा प्रश्न की ईमानदारी को मानते हैं।
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