You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
नील वशिष्ठ बाईस साल से मरते हुए लोगों के आख़िरी शब्द इकट्ठा करता है।
उसका मानना है कि जब इंसान मरने वाला होता है, तब उसके पास झूठ बोलने की ताक़त नहीं बचती। उस आख़िरी पल में जो निकलता है, वही उसकी पूरी ज़िंदगी का सबसे सच्चा वाक्य होता है।
30 साल में उसने 501 से ज़्यादा लोगों के आख़िरी शब्द लिखे। किसी ने माफ़ी माँगी। किसी ने एक पुराना नाम पुकारा। किसी का वाक्य बीच में ही रुक गया। और एक आदमी चुप रहा,, पूरी तरह।
पर जो शब्द नील सबसे ज़्यादा सुनना चाहता था,, अपने पिता के,, वह उसे कभी नहीं मिले।
19 साल की उम्र में, जब उसके पिता देवेंद्र मिश्रा अस्पताल में आख़िरी साँसें ले रहे थे, नील कमरे से बाहर था। सिर्फ़ 15 मिनट। और जब वह वापस आया, तो बहुत देर हो चुकी थी। एक नर्स ने बताया कि उन्होंने आख़िर में पूछा था,, "नील कहाँ है?"
क्या यह सच था? या सिर्फ़ एक दुखी बेटे को दिलासा देने के लिए कहा गया था?
यह सवाल नील कभी नहीं भूल पाया। और इसी सवाल का जवाब ढूँढते-ढूँढते उसने अपनी पूरी ज़िंदगी बना ली,, और बर्बाद कर ली।
"रुकी हुई साँस" एक ऐसे आदमी की कहानी है जो हज़ारों मौतों के क़रीब बैठा, पर ज़िंदगी जीना भूल गया। यह मौत की किताब नहीं है। यह उस वक़्त के बारे में किताब है जो हम ज़िंदा रहते हुए गँवा देते हैं।
जो कहा नहीं, वही सबसे ज़्यादा सुनाई दिया।
विधा: साहित्यिक उपन्यास (Literary Fiction)
भाषा: हिंदी
भाग: भाग 1 संग्रह
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book रुकी हुई साँस.