You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution

Add a Review

पत्थर, चेतना और बनना

पत्थर, चेतना और बनना
SHALU BHAI
Type: Print Book
Genre: Self-Improvement, Philosophy
Language: Hindi
Price: ₹443 + shipping
Price: ₹443 + shipping
Dispatched in 5-7 business days.
Shipping Time Extra

Description

क्या आपने कभी किसी बड़ी असफलता के बाद खुद से पूछा है — "क्या मैं फिर कोशिश करूँ?"
यह सवाल हर इंसान के जीवन में किसी न किसी रात आता है — किसी परीक्षा के नतीजे के बाद, किसी टूटे व्यापार के बाद, किसी अनसुनी दुआ के बाद। "पत्थर, चेतना और बनना" इसी एक सवाल से शुरू होती है, और पच्चीस अध्यायों में इसका सबसे गहरा, सबसे ईमानदार उत्तर खोजती है।
यह किताब लखनऊ के दार्शनिक शालू भाई की मौलिक रचना है — "रेज़िलिएंट असेंट" नामक एक संपूर्ण जीवन-दर्शन का पहला पूर्ण संस्करण। यह दर्शन किसी विश्वविद्यालय की कक्षा में नहीं, बल्कि एक साधारण रात के ईमानदार आत्म-संवाद में जन्मा — नौ शब्दों में:
"फिर करना होगा। शायद बेहतर। उम्मीद रखो।"
इन नौ छोटे शब्दों में पच्चीस सदियों का मानव-चिंतन समाया है। इस किताब में आप मिलेंगे अल्बेर कामू की अर्थहीनता से, फ्रेडरिक नीत्शे के Amor Fati से, विक्टर फ्रेंकल के नब्बे सेकंड के विराम से, इब्न सीना की नाफ़्स नातिक़ा से, इब्न अल-हैसम की वैज्ञानिक पद्धति से, और रूमी-कबीर के काव्य से। पश्चिमी अस्तित्ववाद, इस्लामी दर्शन और भारतीय भक्ति-परंपरा — तीनों धाराएँ यहाँ एक नदी में मिलती हैं।
पाँच नियम — इस दर्शन का व्यावहारिक हृदय:
• असमान विकास — ब्रह्मांड नहीं बढ़ता, तुम बढ़ते हो
• संतुलित उम्मीद — "शायद" शब्द की छिपी शक्ति
• सचेत असफलता — असफलता को डेटा में बदलना
• पहचान परिवर्तन — करना से होना, होना से बस होना
• सामूहिक उत्थान — तुम्हारा विद्रोह किसी और की अनुमति बनता है
यह किताब केवल दर्शन नहीं है — यह तंत्रिका विज्ञान और मनोविज्ञान से भी गहराई से जुड़ी है। न्यूरोप्लास्टिसिटी, मस्तिष्क का SEEKING तंत्र, और सीखी हुई निराशा जैसी वैज्ञानिक खोजों के ज़रिए यह दिखाती है कि यह दर्शन केवल प्रेरणादायक नहीं — मस्तिष्क की बनावट में गहरी जड़ें रखता है।
अर्जुन की चाय की दुकान, फातिमा की अधूरी दुआ, राजेश का पाँचवाँ प्रयास, गोविंद के पैंतालीस साल की खेती — इस किताब में जीवित कहानियाँ हैं, सूखे सिद्धांत नहीं। हर अध्याय एक मानवीय अनुभव से शुरू होकर गहरे दार्शनिक विश्लेषण तक पहुँचता है, और अंत में एक शोध-पत्र तथा पूर्ण संदर्भ-सूची भी शामिल है।
इस किताब की यात्रा छह भागों में फैली है — अस्तित्व के प्रश्न से लेकर, महान विचारकों से मुलाकात, दार्शनिक ढाँचे के निर्माण, वैज्ञानिक प्रमाण, महासंश्लेषण, और अंत में — रोज़मर्रा के जीवन, रिश्तों और दूसरों को सिखाने तक। यह किताब उनके लिए है जो असफल हुए हैं और फिर खड़े हुए हैं। जो छात्र हैं, उद्यमी हैं, माता-पिता हैं, या बस वे लोग हैं जो हर सुबह एक नया "शायद" लेकर उठते हैं। जो जानना चाहते हैं कि गिरना और फिर उठना ही मानवीय गरिमा का सबसे गहरा रूप कैसे है।
पत्थर नहीं बदलता। पहाड़ी नहीं बदलती। लेकिन धकेलने वाला — बदलता है।
आज ही अपनी यात्रा शुरू करें।

About the Author

SHALU BHAI is an individual author. He curious in research, learning, philosophy seeker.

Book Details

Publisher: Self Published
Number of Pages: 253
Dimensions: 6"x9"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

Ratings & Reviews

पत्थर, चेतना और बनना

पत्थर, चेतना और बनना

(Not Available)

Review This Book

Write your thoughts about this book.

Currently there are no reviews available for this book.

Be the first one to write a review for the book पत्थर, चेतना और बनना.

Other Books in Self-Improvement, Philosophy

Shop with confidence

Safe and secured checkout, payments powered by Razorpay. Pay with Credit/Debit Cards, Net Banking, Wallets, UPI or via bank account transfer and Cheque/DD. Payment Option FAQs.