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परिचय
हमारा जीवन दो जगतों के बीच बँटा हुआ है। एक वह 'तारतम्यमय' संसार है जिसे हम हर रोज़ देखते और जीते हैं, और दूसरा वह 'अपरिष्कृत' संसार जो हमारे भीतर कहीं गहराई में दबा हुआ है—कच्चा और सत्य।
'अमूर्त' उसी आंतरिक जगत की एक झलक है।
कई क्षणों में हम निर्णय तो विवेक और ज्ञान के अधीन करते हैं, परंतु फिर भी वे क्षण बंध नहीं पाते। कुछ अनुभूतियाँ ऐसी होती हैं जो किसी ढांचे में नहीं बँधतीं। वे केवल एक 'प्रस्फुटन' की तरह बस हमारे हृदय को महसूस होती हैं—जैसे ज़मीन के नीचे दबे बीज को सूर्य की गर्माहट।
'हृदयद्वार' वह द्वार का प्रहरी है जिस तक यह बाहरी शोर पहुँच कर शांत होता है और भीतर का 'अमूर्त' आकार लेने लगता है। यहाँ दिए गए 25 छंद किसी मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता नहीं हैं, बल्कि रास्ते में मिलने वाले वे पत्थर हैं जिन्हें मैंने बस उठा लिया और सहेज दिया।
यह परिचय है उस 'अपूर्णता' का, जिसके हर टुकड़े में अपनी एक पूर्ण सुंदरता है। यह आमंत्रण है उस 'हृदयद्वार' के आगे झाँकने का, जहाँ सत्य जैसा है, वैसा ही खड़ा है—बिना किसी श्रृंगार के, बिना किसी तारतम्य के, बिना किसी ज्ञान के और बिना किसी परहेज़ के।
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