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महाराजा परीक्षित — कलयुग के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट एवं श्रीमद्भागवत का अमर प्राकट्य
कुरुक्षेत्र के महाविनाशकारी युद्ध के बाद जब पांडव कुल का दीपक बुझने की कगार पर था, तब अश्वत्थामा के प्रलयंकारी ब्रह्मास्त्र से भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में जिस दिव्य बालक की रक्षा की, वे थे चक्रवर्ती सम्राट परीक्षित।
धर्म, न्याय और शौर्य के प्रतीक महाराजा परीक्षित ने कलयुग के प्रभाव को रोककर पृथ्वी पर सत्य और मर्यादा की पुनर्स्थापना की। परंतु जब एक ऋषि-पुत्र के शाप से उन्हें ज्ञात हुआ कि केवल सात दिनों के भीतर तक्षक नाग के विष से उनकी मृत्यु निश्चित है, तो उन्होंने भयभीत होकर रक्षा की गुहार नहीं लगाई, अपितु राजपाट त्यागकर परम वैराग्य धारण किया। गंगा तट पर महर्षि शुकदेव के मुखारविंद से प्रवाहित पावन भागवत-कथा का श्रवण कर उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त की।
12 अध्यायों में विभाजित यह पावन ग्रंथ महाभारत और श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रामाणिक संदर्भों के आधार पर सम्राट परीक्षित के जन्म, शौर्य, शासन, शाप और परम मोक्ष की अमर गाथा को अत्यंत रोचक एवं भक्तिरस-पूर्ण शैली में प्रस्तुत करता है।
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