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अंतःकरण का कुरुक्षेत्र
युद्ध से पूर्व का अंतर्द्वंद्व
क्या किसी कठिन निर्णय से पहले मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष उसके भीतर होता है?
महाभारत की युद्धभूमि पर अर्जुन के सामने खड़ा संकट केवल युद्ध करने या न करने का प्रश्न नहीं था। वह कर्तव्य, करुणा, मोह, भय और विवेक के बीच चलने वाला एक गहरा आंतरिक संघर्ष भी था।
यह पुस्तक उसी अंतर्द्वंद्व को जीवन के परिचित प्रश्नों के माध्यम से देखने का एक साहित्यिक प्रयास है। श्रीमद्भगवद्गीता की प्रेरणा से रची गई यह कथा पाठक को अपने निर्णयों, संबंधों और कर्तव्यों पर नए दृष्टिकोण से विचार करने का अवसर देती है।
यह गीता का अनुवाद या शास्त्रीय भाष्य नहीं, बल्कि उसके शाश्वत प्रश्नों से प्रेरित एक स्वतंत्र रचना है।
कभी-कभी बाहर की परिस्थिति बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलती है। यह पुस्तक उसी परिवर्तन की यात्रा है।
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