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प्रेम में कौन बचा है?
प्रेम—जिसे हम अक्सर पाने, निभाने और खोने की कहानी समझते हैं, क्या सच में इतना ही है?
यह किताब प्रेम के उन्हीं सवालों की यात्रा है, जिनका सामना हम रिश्तों में रहते हुए कभी न कभी करते हैं। अपेक्षाएँ, लगाव, दूरी, अधूरापन, इंतज़ार और खुद से होने वाली बातचीत—इन सबके बीच यह किताब प्रेम को एक अलग नज़र से देखने की कोशिश करती है।
शायद प्रेम किसी को पा लेने का नाम नहीं, बल्कि खुद को समझ लेने की एक यात्रा है।
अगर आपने कभी किसी को चाहा है, खोया है, इंतज़ार किया है या अपने ही मन में प्रेम को समझने की कोशिश की है—तो यह किताब शायद आपको अपनी-सी लगे।
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