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यह पुस्तक एक ऐसे कर्मयोगी के एकाकी संघर्ष की कहानी है, जिसने न केवल हर परिस्थिति में धैर्य, संतोष, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान के साथ अपना जीवन अकेले पार किया बल्कि अपनी वृद्ध और बीमार पत्नी को जब कोई पारिवारिक सदस्य सहयोग-सेवा हेतु उपलब्ध न हुआ तब अकेले ही उसके अंतिम दिनों में उसकी सेवा-सुश्रूषा का सम्पूर्ण दायित्व उठाया। उसका पत्नी के प्रति यह समर्पण समाज के सामने सच्चे जीवनसाथी का एक अनुकरणीय उदाहरण है।
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