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रामपुर जिला अस्पताल में हर चीज का रिकॉर्ड रखा जाता है: हर मरीज, हर दवा, हर लॉग-इन।
जनवरी की एक मंगलवार की सुबह, आईटी इंचार्ज राजीव शर्मा की मेज पर एक प्रिंटआउट रखा जाता है। उसमें कुछ पंक्तियां ऐसी हैं, जिन्हें वहां नहीं होना चाहिए था।
बात छोटी है। इतनी छोटी कि फाइल में दबाई जा सके, इतनी आसान कि कोई भी उसकी सफाई दे दे। अस्पताल में ऐसी बातें रोज दब जाती हैं: कागजों के नीचे, नियमों के नीचे, और उन चुपचाप किए गए समझौतों के नीचे, जिनके सहारे कोई संस्था चलती रहती है।
पर यह बात दबती नहीं।
राजीव जितना उस एक सिरे को खींचता है, उतना ही साफ होता जाता है कि गड़बड़ी किसी सर्वर में नहीं, उन फैसलों में है जो महीनों पहले, किसी और मेज पर, चुपचाप ले लिए गए थे। और यह कि इस इमारत में हर विभाग के पास अपनी प्रक्रिया है, हर अफसर के पास अपनी सफाई, और हर चूक के लिए कोई और जिम्मेदार।
सिस्टम को ताले, पासवर्ड और फायरवॉल बचा लेते हैं।
पर सुरक्षा की एक परत ऐसी भी है, जो किसी मशीन में नहीं होती।
वह उस इंसान में होती है, जिसे आखिर में तय करना पड़ता है कि वह देखी हुई बात को अनदेखा करेगा, या उसे सही करेगा।
जहां सुरक्षा की सीमा समाप्त होती है, वहीं से विवेक की शुरुआत होती है।
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