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कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन की भूमिका किसानों की आय वृद्धि में अत्यंत महत्वपूर्ण है। फसल कटाई के पश्चात अधिक उत्पादन के कारण बाजार में कृषि उत्पादों की अधिकता हो जाती है, जिससे कीमतें तेजी से गिर जाती हैं। ऐसी स्थिति में किसान को अपना उत्पाद अत्यंत कम मूल्य पर बेचना पड़ता है। जो फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे से बाहर हैं, उनमें तो किसान को अपनी लागत भी वापस नहीं मिल पाती। लघु एवं सीमांत किसानों के लिए विपणन योग्य अधिशेष और विपणित अधिशेष में व्यावहारिक रूप से कोई अंतर नहीं रह जाता, क्योंकि उनकी पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद बिक्री हेतु बहुत कम उत्पाद शेष बचता है।
यह पुस्तक इस गंभीर समस्या का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करती है। इसमें विस्तार से बताया गया है कि विभिन्न कृषि उत्पादों को प्रसंस्कृत उत्पादों में किस प्रकार परिवर्तित किया जाए, जिससे उनकी भंडारण अवधि बढ़े और निर्यात मूल्य में भी वृद्धि हो। इसके साथ ही, इन उत्पादों के विपणन की प्रभावी रणनीतियाँ भी सुझाई गई हैं। यंत्रों एवं उपकरणों की साझा खरीद के माध्यम से उत्पादन लागत कम करने के उपाय भी बताए गए हैं। स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) एवं किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) से जुड़कर किसान किस प्रकार सामूहिक शक्ति का लाभ उठा सकते हैं, यह भी इस पुस्तक में सरल एवं बोधगम्य भाषा में समझाया गया है।
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