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"पुणे की सड़कों पर सिर्फ बारिश का पानी नहीं बहता... कभी-कभी वहाँ से लोग गायब हो जाते हैं, और पीछे छूट जाता है सिर्फ एक घना, डरावना अंधेरा।
"कबीर के पास खोने के लिए कुछ नहीं था—सिवाय चारकोल के कुछ टुकड़े, एक सीलन भरे कमरे और अपने स्वाभिमान के।
अनन्या के पास सब कुछ था—एक आलीशान बंगला, रसूखदार नाम और रईसी—सिवाय ज़रा से सुकून के।
घोरपड़ी स्टेशन के वीरान प्लेटफॉर्म पर जब दोनों मिले, तो लगा ज़िंदगी का कोई स्केच पूरा हो रहा है।
पर कबीर को कहाँ पता था कि अनन्या के पीछे पुणे की सड़कों का वह अंधेरा चल रहा है, जहाँ लोग रहस्यमयी तरीके से गायब हो जाते हैं—न पीछे कोई सुराग बचता है, न मुठा नदी के किनारे कोई लाश।
अब अनन्या का हाथ कबीर की स्केचबुक पर है, और प्रताप देशमुख की क्रूर नज़र कबीर की गर्दन पर। क्या एक आर्टिस्ट की मोहब्बत इस अंधेरे को हरा पाएगी, या कबीर भी इस शहर का अगला गायब हो चुका हिस्सा बन जाएगा?
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