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हर दिल की एक अनकही दास्तान होती है, कुछ किस्से लबों तक आते हैं और कुछ सीने में ही दफ़्न रह जाते हैं। जब दर्द, तन्हाइयाँ, और मोहब्बत अल्फ़ाज़ों का मोहताज होकर कागज़ पर उतरने लगती है, तब जन्म होता है सच्ची शायरी का।
यह कविता संग्रह ‘मेरे ख़ामोश अल्फाज़’ सिर्फ कुछ पन्नों और पंक्तियों का मेल नहीं है, बल्कि यह उन जज्बातों का आईना है जो खामोश रहकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं। इस किताब में संजोई गई हर एक गज़ल और शेर इस बात का गवाह है कि जब इंसान अपनों के फरेब, तन्हाई के सफर और टूटे हुए भरोसे से गुजरता है, तो उसकी रूह किस शिद्दत से महसूस करती है।
पहली मुलाकात की वो मीठी यादें, फेसबुक-व्हाट्सएप के दौर की वो अनकही दूरियाँ, बेरुखी और बेवफाई के वो गहरे जख्म, और अंत में खुद के उसूलों पर जीने का हौसला—इन सभी एहसासों को बहुत ही सादगी और गहराई के साथ पिरोया गया है। यहाँ उम्मीदें भी हैं, शिकवे भी हैं, और खुद को समेटकर आगे बढ़ने का जज्बा भी है।
मुझे पूरा विश्वास है कि 'विजय' की कलम से निकले ये खामोश अल्फाज़ जब आप पाठकों के दिलों तक पहुँचेंगे, तो ये आपके अपने दिल की धड़कन और आपके अपने अनकहे अहसासों की आवाज़ बन जाएंगे।
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