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यह एक ऐसे आदमी की कहानी है जो बहुत तेज़ दिमाग़ लेकर पैदा हुआ और उसी दिमाग़ के भरोसे बहुत ग़लत जगहों पर ख़ुद को खो बैठा। उपन्यास अपराध का "गाइड" नहीं है। इसमें अपराध के ब्योरे कम हैं और उसकी क़ीमत ज़्यादा। जो आदमी तरीक़ों में उलझा रहता है, वह अक्सर यह पूछना भूल जाता है कि इसका हिसाब कौन देगा।
कहानी आज के दौर की है। चिट्ठियों की जगह फ़ोन हैं, आवाज़ के संदेश हैं, और ऐसे ऐप हैं जो अपने निशान ख़ुद मिटा देते हैं। हर खंड में एक दूसरी नज़र भी है: पुलिस की फ़ाइलें, जो सालों तक एक ऐसे आदमी का पीछा करती हैं जिसका कहीं कोई नाम दर्ज नहीं।
सफ़र
कहानी अफ़्रीका से शुरू होती है, उस "आदमी जिसका कोई नाम नहीं" से। फिर बलिया का बचपन और घर की राजनीति आती है। इसके बाद ग़ाज़ीपुर का पहला प्रेम और दशहरा, IIT-BHU और नाट्य विद्यालय की बेचैनी, JNU और कृतिका, इलाहाबाद का अपराध-बोध, चंडीगढ़ का सिंडिकेट, रोहिणी के "दो झूठ, दो आईने", हिमाचल-पंजाब-मुंबई-वृंदावन का भटकाव, दान और विदाई, अफ़्रीका में वापसी, और आख़िर में उपसंहार "एक ही सिक्का"।
शैली
किताब कई आवाज़ों में चलती है। कहीं प्रेमचंद, रेणु और राही मासूम रज़ा की याद दिलाती गाँव-चौपाल की धीमी, बतरस वाली भाषा है। कहीं आज के क्राइम-थ्रिलर जैसे छोटे, कटे हुए वाक्य और तेज़ दृश्य हैं। लेखक ने दोस्तोयेव्स्की के अपराध-बोध, कामू की ठंडी निगाह, हेसे के सिद्धार्थ के गृहत्याग और हेमिंग्वे की कसी भाषा की छाया की बात कही है, पर नक़ल से इनकार किया है।
हर खंड में एक आवाज़ लौटती है: "लोग"। ये गाँव, शहर और कैंपस के वे लोग हैं जो सिद्धार्थ के बारे में कभी प्रशंसा, कभी जलन और कभी डर से बातें बनाते हैं। "लोग जो कहते हैं" और "सच जो होता है" के बीच की दूरी ही इस उपन्यास का दर्द है।
अंत का स्वर
आख़िरी अध्याय में पुलिस अकादमी के एक व्याख्यान में सेवानिवृत्त अधिकारी ठाकुर प्रताप नारायण कहते हैं कि वे पूरी उम्र जिस आदमी का पीछा करते रहे, उसे पकड़ नहीं पाए। यह उनकी हार नहीं, एक सच्चाई है। अपराध और प्रशासन "एक ही सिक्के के दो पहलू" हैं, जैसे पाप और पुण्य, दिन और रात। इसलिए अपराध को पूरी तरह मिटाना मुमकिन नहीं है। अफ़सर का काम यह सुनिश्चित करना है कि जब कोई "सिद्धार्थ" किसी आँगन में बैठा हो और अपने भीतर सब कुछ तौल रहा हो, तब रास्ता चुनने से पहले उसके पास कोई सुनने वाला हो
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