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उपन्यास की ताक़त
पाखंड ही कहानी को चलाता है। पहली ही रात मुखिया के बाड़े में माल उतरता है, और निगरानी समिति की अगुआ रेखा देवी का पति छत पर छिपकर पी चुका है। शराबबंदी इसलिए टूटती है कि हर कोई ख़ुद इसमें शामिल है।
सुखू के ज़रिए कहानी में प्रवेश। वह ग़रीब पिता है, बाप की दवा का उधार है, और वह ख़ुद पीता भी नहीं। बिंदू का यह कहना कि "बिगड़ने की चिंता ग़रीब को ही ज़्यादा होती है" उपन्यास की वर्ग-दृष्टि को सबसे सटीक ढंग से पकड़ता है।
अंत में कोई जीत नहीं। नेहा के पुरस्कार पर मंत्री चौधरी का ताली बजाना सबसे चुभने वाला दृश्य है। एक साल बाद नया ठेका खुलता है और दीवार पर "बारह कब कौन गिनेगा" लिखा मिलता है। रिकॉर्डिंग और फ़ाइल "शायद हमारे जीते-जी नहीं" के भरोसे रखी रहती हैं।
लेखक की नीयत साफ़ है। प्रस्तावना में वे कहते हैं कि यह अपराध का महिमामंडन नहीं है। अंत में सुखू का दीपा से कहना, "जो नहीं करना चाहिए था," इसी बात पर मुहर लगाता है।
जहाँ सवाल उठते हैं
निराशा लगभग पूरी है। सत्ता में बैठा हर आदमी बिका हुआ है, इसलिए राजनीतिक संदेश कुछ पहले से तय-सा लगता है।
सबसे बड़े धागे (रिकॉर्डिंग, फ़ाइल) अधूरे छोड़ दिए गए हैं। यह यथार्थवादी है, पर पाठक को अधूरापन भी लग सकता है।
भाषा जानबूझकर खुरदरी है। लेखक ने ख़ुद कहा है कि गालियाँ माहौल की सच्चाई के लिए हैं, पर कुछ जगह वे ज़रूरत से ज़्यादा लग सकती हैं।
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