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पत्थर से स्क्रीन तक भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाओं और लिपियों की एक रोचक, जिज्ञासापूर्ण और तर्कपूर्ण यात्रा है—सिंधु घाटी की रहस्यमयी लिपि से लेकर आज के डिजिटल युग तक।
यह पुस्तक पूछती है कि मनुष्य ने अपने विचारों, अनुभवों और स्मृतियों को शब्दों और संकेतों में दर्ज करना कब और क्यों शुरू किया। सिंधु लिपि, ब्राह्मी, देवनागरी, तमिल-ब्राह्मी और अन्य भारतीय लिपियों की यात्रा के साथ-साथ पुस्तक संस्कृत, प्राकृत, पाली, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास को समझने का प्रयास करती है।
लेखक इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान, विज्ञान और आधुनिक तकनीक को एक साथ रखकर यह समझने की कोशिश करते हैं कि भाषा और लिपि केवल संचार के साधन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की सामूहिक स्मृति हैं।
पुस्तक उन लोकप्रिय धारणाओं और विवादित प्रश्नों पर भी विचार करती है जिनका संबंध भाषा, धर्म, परंपरा, मिथक और भारतीय सभ्यता से है—लेकिन उन्हें अंधविश्वास या पूर्वाग्रह के बजाय तर्क, प्रमाण और वैज्ञानिक दृष्टि की कसौटी पर देखने का आग्रह करती है।
पत्थर पर उकेरे गए चिह्नों से लेकर स्मार्टफोन की स्क्रीन तक—यह पुस्तक मानवता की उस लंबी यात्रा की कहानी है जिसमें भाषा ने हमारी स्मृति, संस्कृति और ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया।
यदि आपको इतिहास, भाषा, लिपि, भारतीय सभ्यता और विज्ञान के बीच संबंधों को समझने में रुचि है, तो यह पुस्तक आपको पढ़ने के साथ-साथ सोचने के लिए भी आमंत्रित करती है।
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