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आख़िर ये ज़ुबाँ बोल पड़ी एक ऐसी कविता-पुस्तक है जहाँ मन के भीतर दबे सवाल, भावनाएँ और अनुभव शब्दों का रूप लेते हैं।
कभी सवाल होता है—“मैं कौन हूँ?”
कभी तलाश होती है—“मैं खुद को कहाँ ढूँढूँ?”
कभी मन पूछता है—“मैं कब बड़ा हुआ?”
और कभी वही मन समाज, रिश्तों, इंसानियत और ईश्वर से सवाल करने लगता है।
इस संग्रह की कविताएँ आत्मचिंतन से लेकर सामाजिक संवेदनाओं तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें अकेलापन है, परिवार है, संघर्ष है, बदलते रिश्ते हैं, समाज की विडंबनाएँ हैं, इंसानियत की तलाश है और उन अनकहे भावों की आवाज़ है जिन्हें अक्सर हम अपने भीतर ही दबा देते हैं।
“आख़िर ये ज़ुबाँ बोल पड़ी” सिर्फ़ कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि उन भावनाओं और सवालों को शब्द देने का एक प्रयास है जो कभी मन में रह जाते हैं और कभी कागज़ पर उतरकर अपनी पहचान बना लेते हैं।
कुछ सवाल…
कुछ मलाल…
कुछ नज़रिए…
और बहुत-सी अनकही बातें।
शायद इन कविताओं में आपको भी अपने मन की कोई ऐसी आवाज़ सुनाई दे, जिसे आपने कभी शब्द नहीं दिए।
आख़िर… ये ज़ुबाँ बोल पड़ी।
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