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आख़िर ये ज़ुबाँ बोल पड़ी

अभिनव पाराशरी
Type: Print Book
Genre: Literature & Fiction, Poetry
Language: Hindi
Price: ₹249 + shipping
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Description

आख़िर ये ज़ुबाँ बोल पड़ी एक ऐसी कविता-पुस्तक है जहाँ मन के भीतर दबे सवाल, भावनाएँ और अनुभव शब्दों का रूप लेते हैं।

कभी सवाल होता है—“मैं कौन हूँ?”
कभी तलाश होती है—“मैं खुद को कहाँ ढूँढूँ?”
कभी मन पूछता है—“मैं कब बड़ा हुआ?”
और कभी वही मन समाज, रिश्तों, इंसानियत और ईश्वर से सवाल करने लगता है।

इस संग्रह की कविताएँ आत्मचिंतन से लेकर सामाजिक संवेदनाओं तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें अकेलापन है, परिवार है, संघर्ष है, बदलते रिश्ते हैं, समाज की विडंबनाएँ हैं, इंसानियत की तलाश है और उन अनकहे भावों की आवाज़ है जिन्हें अक्सर हम अपने भीतर ही दबा देते हैं।

“आख़िर ये ज़ुबाँ बोल पड़ी” सिर्फ़ कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि उन भावनाओं और सवालों को शब्द देने का एक प्रयास है जो कभी मन में रह जाते हैं और कभी कागज़ पर उतरकर अपनी पहचान बना लेते हैं।

कुछ सवाल…
कुछ मलाल…
कुछ नज़रिए…
और बहुत-सी अनकही बातें।

शायद इन कविताओं में आपको भी अपने मन की कोई ऐसी आवाज़ सुनाई दे, जिसे आपने कभी शब्द नहीं दिए।

आख़िर… ये ज़ुबाँ बोल पड़ी।

About the Author

एक युवा हिंदी कवि और लेखक हैं, जो अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन, समाज, रिश्तों, इंसानियत और आत्मचिंतन से जुड़े सवालों को शब्द देते हैं। उनकी लेखनी में रोज़मर्रा के अनुभवों के साथ-साथ उन भावनाओं और विचारों की झलक मिलती है जिन्हें अक्सर हम अपने भीतर ही दबा देते हैं।

उनकी कविताएँ कभी स्वयं से सवाल करती हैं—“मैं कौन हूँ?”, कभी जीवन से पूछती हैं—“मैं कब बड़ा हुआ?”, और कभी समाज, रिश्तों तथा इंसानियत के सामने आई सच्चाइयों को देखने का प्रयास करती हैं।

“आख़िर ये ज़ुबाँ बोल पड़ी” उनके लिए केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि मन में उठते सवालों, भावनाओं और अनुभवों को अपनी आवाज़ देने की पहली कोशिश है।

“संवाद है, इसलिए लिखता हूँ, ताकि महसूस कर सकूँ।”
— अभिनव पाराशरी

Book Details

Number of Pages: 77
Dimensions: 8.28"x11.71"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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